अनाड़ी
अनाड़ी
ये निश्चल मन वैसे तो हमेशा से ही अकेला था l
अपनो के बीच छला जो जाता था हमेशा ।
"अरे तुम अपना फलसफा अपने पास रखो "जब भी सुनता चुपचाप हो जाता सबको अपने मन की करते ,बोलते देखता और चुप्पी साध लेता।
आज फिर वही तो हुआ , जब अपनो को ही अपना मजाक उड़ाते सुना "अरे वो बेवकूफ है भावुक मूर्ख उसे तो दूर ही रहने दो।"
भरे दिल से चल दिया था। खुली हवा में सांस लेने- "अच्छा हुआ नहीं तो पता नही क्या क्या सुनना पड़ता "
दूर कही गाना बज रहा थामन सुनकर झूम उठा "सच है दुनिया वालो के हम है अनाड़ी सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी।
