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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Fantasy


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

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अकाय - पार्ट (2-8)

अकाय - पार्ट (2-8)

58 mins 211 58 mins 211

यमदूत जी के साथ सत्यम श्मशान में खड़ा होकर अपनी और माँ की चिता को जलते देख रहा था। तभी यमदूत के सिंगनुमा एंटीना में ब्लिंक होने लगा। वो तुरंत भीड़ से अलग हट गए और बाए हाथ से दोनों एंटीना के टिप को सटाया और दाहिने हाथ से छाती पर लगे डिस्प्ले पर कुछ वर्चुअल बटन को दबाया और तुरंत एक दूसरा यमदूत वहाँ प्रगट हो गया। फिर उसके आँख में आँख डालकर कर यमदूत ने कुछ बुदबुदाया जिसको सत्यम सुन और समझ नहीं पाया। नया यमदूत वहाँ से तुरंत गायब हो गया।

उत्सुकतावश सत्यम ने यमदूत से पूछा कि अभी अभी जो मैंने देखा वह क्या है ? यमदूत ने मुस्कुराकर कर कहा वह मेरा क्लोन था जिसको मैंने दूसरी जगह ड्यूटी पर भेज दिया। हमारे यहाँ वर्क एथिक मृत्यलोक से अलग है। देवलोक में जिसको जो जिम्मेदारी दी जाती है उसके निष्पादन के लिए वही उत्तरदायी है। लेकिन उसके लिए उसको पर्याप्त शक्तियाँ और स्वतंत्रता उपलब्ध होती हैं। उसमें कोई भी तबतक दखल नहीं करता जबतक दूसरे के कर्तव्य निर्वाहन में बाधा नहीं उत्पन हो। यदि किसी से कोई गलती हो जाए तो सभी देवता उसको सुधारने में सहयोग करना अपना कर्तव्य समझते हैं। यदि किसी देवता ने वरदान दे दिया तो वह फलीभूत हो यह पूरे तंत्र की जिम्मेदारी बन जाती है।

सत्यम - क्या आप कोई ऐसा उदाहरण मुझे दे सकते हैं जिससे मुझे देवलोक का इकोसिस्टम समझ में आ सके।

यमदूत - भस्मासुर की कहानी तो तुमने सुनी ही होगी। उसने भोलेनाथ की घनघोर तपस्या की। महादेव तो आसुतोष हैं , उन्होंने उसको उसकी इच्छानुसार यह वरदान दे दिया कि तुम जिसके सर पर अपना दाहिना हाथ रख दोगे वह जलकर भस्म हो जाएगा। वो उस दुष्ट दानव के इरादे को नहीं भाप पाए। उसने आशीर्वाद मिलते ही कहा कि अब अपनी पत्नी पार्वती को मेरे हवाले करो नहीं तो तुमको ही भस्म कर दूँगा। उसके डर से उनको कैलाश छोड़कर भागना पड़ा। महादेव छुपते फिर रहे थे और कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। अंततोगत्वा विष्णु जी ने मोहिनी रूप धारण करके उसका विनाश किया। भस्म करना अग्निदेव का काम है लेकिन महादेव के वचन का मान रखने के लिए वो किसी को भी भस्म करने को मजबूर थे। इसीलिए देवता किसी को भी आजतक अमर होने का वरदान नहीं देते हैं। मालूम नहीं यह स्वावलंबी और स्वचेतना रखने वाली आत्मा उस पार्थिव शरीर से क्या कर गुजारे।

सत्यम - यदि वरदान देने के बाद यह ज्ञात हो कि यह सदपात्र नहीं है तो क्या उस वरदान को वापस नहीं लिया जा सकता है ?

यमदूत - कदापि नहीं , यदि ऐसा होने लगे तो फिर वरदान की पवित्रता और महत्ता ही समाप्त हो जाएगी। फिर वरदान पाने के लिए ना ही कोई प्रयत्न करेगा और ना ही कोई श्राप से डरेगा। वरदान में कोई तबदीली नहीं हो सकती है और श्राप में भी वापस लेने कि व्यवस्था नहीं है। लेकिन श्राप में पुनर्विचार और संशोधन का प्रावधान है। क्योंकि वरदान एक आशीर्वाद है और श्राप एक दंड है।


सत्यम - इसका कोई दृष्टांत दे सकते हैं ?


यमदूत - तुमने गौतम ऋषि का तो नाम सुना होगा। एक बार देवराज इंद्र उनकी पत्नी अहिल्या की सुंदरता पर मोहित हो गए। उनको पाने के लिए उन्होंने छल किया और जाने अनजाने जिसकी भी उसमें भूमिका रही गौतम ऋषि ने सबको श्राप दिया और ऐसा श्राप दिया कि पूरे देवलोक की व्यवस्था ही चरमरा गई।

पत्नी को पत्थर बना दिया, बेटी अंजनी को कुंआरी माँ बनने का श्राप दिया, अग्नि को श्राप दिया कि तुममें अब कोई भी पवित्र चीज नहीं डालेगा और इंद्रदेव को श्राप दिया कि जिस चीज की लालसा में तुमने यह पाप कर्म किया है वह तुम्हारे शरीर में एक हजार हो जाए।

किसी भी पूजा पाठ में यज्ञ और हवन की काफी महत्ता है क्योंकि देवी देवता को उससे ताकत मिलती है। मनुष्य की चाहत की देवलोक तक सम्प्रेषण का वह एक शशक्त और जीवंत माध्यम है।

गौतम जी के श्राप के चलते पूजा पाठ, हवन-धूप आदी बंद हो गया। मृत्यलोक का देवलोक से सम्प्रेषण और संपर्क का सुलभ और शशक्त माध्यम बाधित हो गया। इंद्र अब शर्म के मारे दरबार में नहीं आ रहे थे। बेटी अंजनी भी अपना मुँह छुपाने के लिए समाज से दूर एकांत जंगल में चली गयी। परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी देवतागण ने मिलकर गौतम ऋषि से आग्रह किया कि आप अपने श्राप पर पुनर्विचार करे नहीं तो पूरी व्यवस्था पंगु हो जाएगी।

कुछ समय बाद जब उनका क्रोध शांत हुआ तो उनको भी लगा कि उन्होंने जो श्राप दिया है वह असमानुपतिक है। फिर देवतागण का आग्रह मानते हुए उसमें संशोधन किया।

अपनी पत्नी अहिल्या को कहा कि त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श से उसको शिला जीवन से मुक्ति मिलेगी। बेटी को कहा वह कुंवारी माँ तो बनेगी लेकिन उसका पुत्र इतना महान होगा कि उसे कोई भी हेय दृष्टि से नहीं देखेगा। महाबली हनुमान जी उनके ही पुत्र हैं। अग्नि के संबंध में कहा की साल में एक रोज लोग अपवित्र चीज डाल सकते हैं और होलिका दहन का दिन वही है। इसीलिए शरीर का उबटन होली के आग में डाल जाता है। देवराज इंद्र को कहा कि हजार भगिन्द्री चक्षु में बदल जाए। इसीलिए इंद्र का एक नाम सहस्त्राचक्षु भी है।


सत्यम को यह सब बातें अजीब लेकिन दिलचस्प लग रहीं थी। इस बीच उसका और उसकी माँ का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। जो भी परिचित और रिश्तेदार आए थे उन्होंने दो मिनट का मौन रखा फिर श्रद्धांजलि दिया। यह कार्यक्रम श्मशान भूमि के हॉलनुमा बैठक में हुआ। सत्यम शायद दुनिया का पहला व्यक्ति था जो अपनी शोक सभा में अमूर्त रूप में उपस्थित था और लोगों के उदगार को सुन रहा था। एक दो चेहरे तो आँसू से सराबोर थे लेकिन सत्यम ने जीते जी कभी यह महसूस नहीं किया कि उनको हमारे परिवार से इतनी आत्मीयता और हमदर्दी है। उसको लग रहा था अकाय सत्यम ने उल्टा चश्मा पहन रखा है।

उसके पड़ोसी संकटा सिंह कह रहे थे शीला भाभी बहुत ही मृदु स्वभाव की थी और हमेशा दूसरे को मदद करने को तत्पर रहती थीं। मेरी पत्नी एकदम कर्कशा है और हमेशा झगड़ने के मूड में रहती है। उसके इस स्वभाव का शिकार कई बार शीला भाभी भी हो चूंकि हैं। इसके लिए मैंने व्यक्तिगत रूप से बहुत बार क्षमा याचना की है। वो मुझसे कहती "स्वभाव और और अंगूठे का निशान जीवन भर नहीं बदलता। अतः अपनी पत्नी के लिए खुद को दोषी मत समझो "

राधा और सत्यम एक दूसरे को प्यार करते थे। लेकिन सत्यम हमेशा डरता था कि राधा के पिता कहीं उसको अस्वीकार न कर दें। लेकिन उसके पिता की बात सुनकर उसको संतोष हुआ और अपने मरने का बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा " सत्यम और उसके माँ की मौत मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। मैं सत्यम को अपना दामाद बनाना चाहता था , हमलोग केवल उसके अपने पैर पर खड़ा होने का इंतजार कर रहे थे। इस संबंध में मेरी और सत्यम के माँ के बीच बात भी हो चुकी थी।" इतना कहकर वो रो पड़े। रोने का मन तो सत्यम का भी कर रहा था लेकिन अकाय आँखों से आंसू नहीं छलकते।

सत्यम का लंगोटिया यार प्रकाश के आंसू तो रुकने का ही नाम नहीं ले रहे थे। शोक सभा मे जब उसकी बोलने की बारी आई तो वह सिर्फ हाथ जोड़कर इतना ही कहा "भगवान ने मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया "। फिर फफक कर रोने लगा। सत्यम की भी इच्छा हुई उसके गले लगकर रोने की।

सत्यम की स्थिति को देखते हुए यमदूत ने कहा अब मैं यहाँ से चलता हूँ क्योंकि मैंने तुम्हारी माँ की आत्मा को देवलोक भेज दिया। 

सत्यम ने हाथ जोड़कर यमदूत से कहा मैं सब कुछ देख-सुन सकता हूँ और महसूस भी कर सकता हूँ लेकिन कुछ कर नहीं सकता। यह स्थिति बहुत ही कष्टदायी है। आप मुझे इस स्थिति से बाहर निकालें या कोई उपाय बताएं कि मैं अपना बाकी का मृत्यलोक अवधि ठीक ठाक से गुजार सकूँ।

तुम चिंता मत करो वक्त के साथ तुमको अन्य भटकती आत्मा से जान पहचान हो जाएगी फिर अकाय जीवन में भी आनंद आएगा। लेकिन सावधान रहना कुछ भी गलत संगत मत करना नहीं तो यह जीवन भी कष्टमय हो जाएगी।

सत्यम - लेकिन मुझे तो आपके अतिरिक्त कोई नहीं दिख रहा है। 

यमदूत- मेरी उपस्थिति के चलते उनलोगों ने अपने को अदृश्य कर रखा है। मेरे जाते ही वो लोग आगे बढ़कर तुमसे संपर्क करेंगे और अपने समूह में शामिल करना चाहेंगे।

सत्यम - मुझे भटकती आत्मा से बहुत डर लगता है। बहुत सारी उनकी डरावनी कहानी सुन चुका हूँ। माँ भी कहती थी रात में अकेले बाहर मत जाना।

यमदूत ने मुस्कराकर कहा तुमको अब डरने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि तुम खुद एक भटकती आत्मा हो।

मैं तुमको एक विशेष शक्ति प्रदान करता हूँ उसके चलते तुम अपनी इच्छा से किसी के भी शरीर में प्रवेश कर सकते हो लेकिन अधिकतम पांच मिनट ही उस शरीर मे रह सकते हो। लेकिन जिस दिन तुम इस शक्ति का दुरुपयोग करोगे उसी क्षण यह क्षमता समाप्त हो जाएगी।

इसके अतिरिक्त तुम जब चाहोगे मुझसे संपर्क स्थापित कर सकते हो। मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा है कि मैं तुमको यह शक्ति क्यों दे राह हूँ। लेकिन इसके पीछे कुछ तो कारण होगा जो शायद मुझे भी ज्ञात नहीं है।

सत्यम - मैंने सुना है कि भूत भी अपना रूप बदल लेते हैं तो फिर आपके द्वारा प्रदत यह शक्ति उससे अलग कैसे होगी।

यमदूत - तुम्हारा प्रश्न तर्कसंगत है। कोई भी भटकती आत्मा या जिसको तुम भूत कहते हो वो अपनी इच्छा से रूप नहीं बदल सकते। वो किसी तांत्रिक के निर्देश या मदद से ही ऐसा कर सकते हैं। उसके एवज में उस भूतात्मा को उस तांत्रिक की जायज / नजायज माँग को पूरा करने में मदद करना पड़ता है। यह उस आत्मा के कर्म संचयिका को विद्रूप करता है। पूरे इकोसिस्टम में आत्मा को स्वायत्तता है लेकिन निरंकुशता या उच्छऋंखलता अस्वीकार्य है। उसको कर्मविधान के हिसाब से कर्मफल भुगतना पड़ता है। 

यह कर्मफल ही निर्धारित करता है कि अगले जन्म में अमुक आत्मा को किस जीव का जन्म मिलेगा और उसका जीवन कैसा होगा। इसको प्रारब्ध कहते हैं।


अकाय - पार्ट 3


सत्यम ने यमदूत से पूछा कि अभी आपने प्रारब्ध की बात कही यह क्या होता है? इसका मेरी अकाय जीवन से कुछ संबंध है क्या ?


यमदूत - देखो, पूरा ब्रह्मांड एकिकृत इकाई है और इसके प्रत्येक तत्व को अपने कर्म की स्वतंत्रता है। प्रत्येक जीव को कुछ जन्मजात और स्वभावगत विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। यह तंत्र एक स्वचालित सतत प्रक्रिया है जिसमे कोई भी हस्ताक्षेप नहीं करता है। 

देवलोक केवल नियामक की भूमिका में है। नियंता तो उनके लिए भी अज्ञात और अदृश्य है। अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए जो भी पुण्य और पाप तात्कालिक जीवधारी आत्मा से होता है उसकी संचयिका देवलोक में बनती रहती है। इसमें तन ,मन और वचन द्वारा किए सभी कामों का हिसाब होता है। यही फ़ाइल उस आत्मा के अगले जन्म का प्रारब्ध बनता है और यह तय करता है कि उस आत्मा को कौन सा शरीर मिलेगा और उसकी क्या नियती होगी।

अच्छा अब मैं चलता हूँ शेष बातें अगली मुलाकात में होगी। हाँ, जब कभी मेरे से संपर्क करना चाहो केवल एकाग्रचित होकर मन से याद करोगे तो मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगा। याद रखना मैं एक यमदूत हूँ और मेरा भी कार्यक्रम काफी व्यस्त रहता है।

इतना कहते ही वो अंतरध्यान हो गए। उसके अंत्येष्टि में शामिल होने को आए सभी लोग अपने घरों को लौट गए। वह भी श्मशान से बाहर निकाला और कहीं एकांत में बैठकर अपनी तत्कालीन परिस्थिति के बारे में विचार करना चाहता था। क्या खोया क्या पाया इसका आकलन करना चाहता था। उसके सामने तो जीवन संघर्ष का अलग रूप था। भौतिक शरीर नदारद था लेकिन वो आत्मा साथ थी जिसकी यादें, अनुभूतियां और जज्बात जीवंत महसूस होते थे। आज उसको लग रहा था कि शरीर का होना कितना महत्वपूर्ण है। उसने निर्णय लिया कि चलकर नाना-नानी पार्क के उस झूले पर बैठकर सोचता हूँ अब आगे क्या करना है क्योंकि अकाय रूप में यह उसका पहला दिन था। उसने महसूस किया कि वह हवा में तैर रहा है और पलक झपकते ही वह पार्क के झूले पर बैठा था। 

उसको यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वह कहीं भी हवा की तरह पहुँच सकता है। उसको तो अब ट्रेन बस का इंतजार नहीं करना है , टिकट भी नहीं निकलना है। यह तो मजेदार है अब वह घूमने के लिए हर उस जगह पर जा सकता है जहाँ वह जाना चाहता था लेकिन आर्थिक तंगी और गाड़ी भाड़ा के चलते नहीं जा पाया था। फिर झूले से उतरकर वह पार्क में लगे फाउंटेन के पास तक गया। इससे उसको यह पक्का हो गया कि वह नजदीक की दूरी चलकर भी पूरा कर सकता है। वापस झूले पर आकर बैठ गया और आँख बंद करके विचारमग्न हो गया।

बहुत सारे विचार उसके दिमाग में बादलों की तरह उमड़ - घुमड़ रहे थे। कभी पिछले जीवन की खटी मिठी यादें आकर गुदगुदा जाती और कभी मुँह चिढ़ाकर चली जाती। कभी निराशा से भर जाती की जीते जी जब कुछ नहीं उखाड़ पाए तो अभी क्या कर लोगे। तुम कौन से महान वैज्ञानिक या राजनेता थे जिनका कोई सपना अधूरा छूट गया उसको पूरा करना है। निम्न आयवर्ग की संघर्षरत अनगिनत कहानियों की तरह तुम्हारे परिवार की भी कहानी है। जिंदा रहने के लिए संघर्ष करना और खुशी के लिए तरसते हुए टें बोल जाना। कुछ लोग क्षणिक आनंद के लिए अपने को शराब के हवाले कर देते , फिर पुरे घर की खुशी और प्रतिष्ठा तहस नहस हो जाती।

उसने अपने सारे विचारों को झटक दिया और सोचा की अकाय जीवन की नई यात्रा थोड़ी अलग है, इसका सदुपयोग करके खुशी और संतुष्टि प्राप्त करने की कोशिश करूँगा। खुशी का विचार आते ही उसको राधा की याद आयी।

माँ के बाद उसको राधा ही तो प्यार करती थी। उसको मेरे ऊपर कितना भरोसा था कि वह अपनी पूरी जिंदगी मेरे साथ बिताना चाहती थी। मैं आज पूरा दिन अपनी ही उलझन में पड़ा

रहा। एक बार भी उसकी सुध लेने का ध्यान नहीं रहा। इस बात से सत्यम को आत्मग्लानि महसूस हुई। उसको यह लगा कि दर्द उसको नहीं होता जो चला जाता है, दर्द तो उसको होता है जो यहाँ रह जाता है। यह तड़प और बढ़ जाती है जब आपको आधिकारिक रूप से शोक मनाने का अधिकार नहीं है। आज वह समाज में मेरे लिए खुलकर आँसू भी नहीं बहा सकती। इस दुख की घड़ी में उसको एक कंधे का सहारा चाहिए जिसे वो अपने आँसू से गिला कर सके। वह तत्काल जाकर राधा से मिलने के लिए सोचा। उसने आँख खोला तो देखा कि एक पुलिस इंस्पेक्टर उसके सामने खड़ा मुस्कुरा रहा है। सत्यम उसको अनदेखा करके निकलने लगा क्योंकि उसको राधा के पास पहुँचने की जल्दी थी।

पुलिस इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर सत्यम से अपना परिचय दिया " मेरा नाम रवि शेखर है और मैं तुम्हारा अकाय दुनिया में स्वागत करता हूँ। मेरी पारखी नजर कह रही है कि तुम अभी भी पवित्र आत्मा हो लेकिन इसकी पवित्रता को बचाए रखना सकाय दुनिया जैसा ही कठिन काम है। मेरे अनुभवों की कभी भी जरूरत हो तो बता देना। अब मैंने घुस लेना छोड़ दिया है।"


सत्यम - आपकी भी क्या मेरी तरह अकाल मृत्यु हुई थी ? आपने मुझे कैसे ढूंढा और पहचाना ?


रवि - हाँ , मेरी धोखे से हत्या की गई थी। मैं अकाय रूप में भी पुलिस स्टेशन चला जाता हूँ। वहाँ की गतिविधि पर नजर रखता हूँ। भले ही कुछ कर नहीं पाउँ लेकिन अपनी पुलिसिया सोच से बाहर नहीं निकल पाता हूँ।

देखो , सकाय दुनिया में लोगों का उसी से रिश्ता बनता है या वही संपर्क में आता है जिसका आपसे कुछ लेन-देन बाकी रह गया हो। इसे कर्म का लेखा जोखा कहते हैं। जो आपके जितना करीब है समझ लेना उसका उतना ही बड़ा हिसाब चुकता करना बाकी रह गया है।

अकाय दुनिया में यह सिद्धांत लागू नहीं होता है। यहाँ संयोग या अनुशंसा के आधार पर रिश्ते बनते हैं। क्योंकि यह तो उस जीवात्मा की यात्रा का ट्रांजिट टाइम है। 


सत्यम - अभी मैं थोड़ी जल्दी में एक जगह जाना चाहता हूँ। मैं आपसे बाद में मिलता हूँ। लेकिन आप से मैं संपर्क कैसे करूँगा या आप कहाँ मिलेंगे।


रवि - तुमको जब भी मेरे से संपर्क करना हो आँख बाद करके मेरे चेहरे को ध्यान में रखकर तीन बार "इंस्पेक्टर रवि" बोलना उसके बाद अपना मैसेज दे देना। मेरी तरफ से उसका उत्तर आ जाएगा। यदि मेरा उत्तर नहीं मिला तो समझ लेना मैं किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में हूँ जहाँ तुम्हारा सिग्नल नहीं पहुँच पा रहा है। लेकिन मुझे यह सूचना मिल जाएगी कि कौन मुझसे संपर्क करना चाहता है।

सत्यम ने कहा ठीक है इंस्पेक्टर साहब मैं आप से बहुत जल्द मिलता हूँ और उम्मीद करता हूँ हम दोनों की जान पहचान आगे बढ़ेगी और हम अच्छे दोस्त बन पाएँगे।

रवि ने कहा क्यों नहीं , मुझे भी अगली मुलाकात का इंतजार रहेगा।

उसके बाद सत्यम तेज कदमों से चलकर राधा के घर की तरफ बढ़ गया। उसको राधा को देखने की इच्छा हो रही थी। यह लगभ अर्धरात्री का समय था। गलियां सुनसान पड़ी थी। रात की भयावहता वातावरण पर हावी थी। स्ट्रीट लैंप के इर्दगिर्द मंडराते किट पतंगों के अतिरिक्त कोई आवाज सुनने को नही मिल रही थी। वह सोंचने लगा इतनी रात को राधा से मिलना सही होगा क्या , वह मिलेगी क्या , वह सो गई होगी या मेरी याद में बैठकर रो रही होगी?

राधा का परिवार अपनी गरीब बस्ती के धनी परिवारों में से एक है। उसके पिताजी सरकारी राशन का दुकान चलाते हैं और साथ मे एस्टेट एजेंट का भी कारोबार करते हैं। उनका खुद का चार कमरे का दो मंजिला पक्का मकान है जिसके चारों तरफ चाहरदीवारी है। उसको यह मालूम था कि राधा का कौन सा कमरा है लेकिन कभी भी उसके कमरे के अंदर नहीं गया था। कभी कभार उसके घर जाता और उसके ममी पाप घर पर भले ना हों दादी की रुकावट हमेशा बनी रहती। वैसे भी दोनों का एक दूसरे के प्रति कमिटमेंट इतना स्ट्रांग था कि उन दोनों में से किसी को भी मौका का फायदा उठाने की जल्दबाजी नहीं थी। यह दुर्घटना यदि नहीं घटी होती तो अगले साल राधा का ग्रेजुएशन पूरा होते ही दोनों शादी कर लेते। एक साल में सत्यम भी नौकरी का कुछ ना कुछ जुगाड़ कर ही लेता। लेकिन उन बातों का अब क्या फायदा। जीवन का बिता हुआ कल रद्दी पेपर है और वर्तमान न्यूज़पेपर और आनेवाला कल क्वेश्चन पेपर।

यही सब सोंचते चलते वह राधा के घर पहुँच गया। अब उसको नहीं गेट खुलने का इंतजार करना है , नहीं डोर बेल बजाना है , नहीं किसी के रोकने टोकने का डर। वह बिना किसी रुकावट के राधा के बंद बेडरूम में पहुँच गया। कमरे में अंधेरा था लेकिन सत्यम को एकदम साफ दिख रहा था। उसको पहली बार महसूस हुआ कि अकाय जीवन में दिन रात एक समान ही है। राधा अपने पलंग पर सीधे लेटी पड़ी है और दाहिने हाथ से आँख ढक रखा है। उसके गोल गोल गोरे गाल पर आँसू की कई लकीरें अपने आप सुख चुकीं हैं। इससे इतना तो स्पष्ट है कि राधा ने अविरल आँसू बहाया है। अभी वह नींद में नहीं थी बल्कि रोते रोते उसकी आँखें थक कर विश्राम कर रहीं थीं।

सत्यम की इच्छा हुई कि वह राधा को बाहों में भर ले और उसके रुखसार पर लुढ़क कर सुख चुके आँसू को अपने होठों से गिला कर दे। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि उसके छुअन को वह महसूस नहीं कर पाती।

वह राधा के स्लीपिंग ब्यूटी को अपलक निहारता रहा। वह सफेद रंग की नाइटी पहनी थी जिसपर लाल, पीले , हरे और नील छोटे छोटे गोल गोल प्रिंट एक खास ज्यामितीय आकर में बने हुए थे। शायद उसने अभी नया खरीदा था। वैसे भी राधा को नाइटी में देखने का उसका पहला अवसर था क्योंकि वह केवल रात में सोते वक्त ही इसे पहनती थी। नींद में अस्त व्यस्त हो चुके वस्त्र में उसके अप्रतिम सौंदर्य को निहारना उसको अच्छा लग रहा था। नींद में जब उसने करवट बदला तो तकिए के खिसकने से उसके नीचे रखी एक तस्वीर बाहर झांकने लगी। वह तस्वीर सत्यम की थी। यह देखकर उसको संतोष हुआ कि राधा सचमुच उसको प्यार करती है। लेकिन इस बात का दुख बढ़ गया कि वह उसका साथ नहीं दे पाएगा। 

करवट बदलते ही उसके रेशमी जुल्फों की कुछ लटें उसके चेहरे पर फैल गयीं। सत्यम ने बड़े ही नजाकत से उन गेसुवों को उसके चंद्रमुखी चेहरे से हटाया। वह सोंचने लगा काश, यह पल यों ही ठहर जाए पहर सदियों में बदल जाए और वह अपनी राधा को अपलक निहारता रहे। लेकिन उसकी यह भावना भी उसके अंदर ही घुटकर रह गयी क्योंकि वह इसको राधा तक संप्रेषित करने में असमर्थ था।

कुछ क्षण पहले अंधेरे कमरे में निर्विघ्न रूप से अपनी राधा के स्लीपींग ब्यूटी का आनंद लेते समय अकाय जीवन अच्छा लग रहा था , अभी उससे अपनी बात नहीं कह पाना कष्टकारी लग रहा है। 

सत्यम अपनी राधा को बहुत देर तक निहारता रहा। जब अपनी अकाय स्थिति का भान हुआ तो उसको सोता छोड़कर उसके कमरे से बाहर निकल गया। सत्यम जैसे ही गैलरी में पहुँचा , भोडा भौंकने लगा। दादी निंद में ही बड़बड़ाने लगी इतनी बिरत रात को क्या देख लिया जो भौंक रहा है। यह बात सुनकर सत्यम को लगा शायद भोडा उसकी उपस्थिति को महसूस कर पा रहा है।


अकाय - पार्ट4


सत्यम इसी दुविधा में राधा के घर से बाहर निकल आया कि भोडा ने उसकी उपस्थिति को पहचानकर भौंका या बस यों ही स्वभावगत भौंक दिया। लेकिन इसका निराकरण वह कैसे करे यही सोचता वह निरुद्देश्य सुनसान सड़क पर बढ़ रहा था।

इस समय रात का लगभग तीन बज रहा होगा। रात की निखार अपनी परकाष्ठा पर थी। चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। गली के अवारा कूते भी अपने उपलब्ध आशियाने में आराम फरमा रहे थे। टिमटिमाते तारे चाँद की अनुपस्थिति में आसमान की खूबसूरती को अलग ही आयाम दे रहे थे। ऐसा लग रहा था रात रानी सितारों जड़ा काली साड़ी का आँचल लहराते उसके साथ चल रही है। धीरे धीरे बहती ठंढ़ी बयार ऐसा लग रहा था मानो रात रानी का पल्लू छूकर सरसराता निकल गया हो। रात का इतना खूबसूरत नजारा उसने नहीं देखा था। लेकिन आज वह उसको महसूस कर रहा था। क्या हर रात इतनी ही खूबसूरत होती होगी जिसको मैंने सोकर बिताया है ?

अभी वह कुछ ही कदम बढ़ा था की एक तकरीबन छः फ़ीट लंबा ब्लैक कोबरा जीभ लपलपाता मस्ती में रेंगता जा रहा था। यदि वह अकाय नहीं होता तो इस कोबरे को देखकर जान मुँह को आ जाता। अभी उसके डरने का कोई कारण नहीं था। 

सत्यम के पास भी कोई काम नहीं था इसलिए उस साँप का पीछा करता पुराने खंडहर में पहुँच गया जहाँ उसका स्थायी निवास था। वह मस्ती में रेंगता हुआ पुराने वटवृक्ष पर चढ़कर एक डाल पर लिपट कर बैठ गया। रास्ते में एक चूहा उसके सामने से गुजरा लेकिन उसको खाने का उसने प्रयास नहीं किया। इतने विषधर को उसके प्रकृतिक परिवेश में इतने करीब से देखने का कभी मौका नहीं मिला था।

सत्यम उस कोबरे का काफी देर तक अवलोकन करता रहा। ऐसा लग रहा था की वह अंदर से बेचैन होने लगा है। वह अपने शरीर को एक खास अंदाज में फूला पिचका रहा था। फिर वो दो टहनी के बीच के सकरे रास्ते से गुजरते हुए अपना केचुल उतार दिया। कोबरा का केचुल उतारने की प्रकिरिया को देखना एक अलग ही अनुभव था। फिर वह पेड़ के एक खोडर मे घुस गया। शायद यह उसका स्थायी विश्राम स्थल हो। जिस बेफिक्री और निर्भयता से वह यहाँ विचरण कर रहा था उससे लग रहा था कि वो अपने घर में हो। वैसे भी इस क्षेत्र में रात की तो बात छोड़ो दिन में भी कोई नहीं आता है। सत्यम के घर से इस खंडहर की दूरी लगभ डेढ़ किलोमीटर होगी लेकिन आज तक कभी भी उसने अंदर कदम नहीं रखा था। सभी बड़े लोग उधर जाने से मना करते थे। कहते अंदर खतरनाक जीव जंतु और भूत रहते हैं। अभी तक उसने साँप और बिच्छू देखा। 

खंडहर के अंदर बेतरतीब तरीके से झाड़ियाँ उगी हुई थी और उसके पीछे एक तीव्र ढलान थी जो नदी में मिलती थी। आज की तारीख में वो नदी लगभग नाले में तब्दील हो चुका है। लोग कहते हैं कि किसी जमाने मे यह सकुना नदी लोगों की प्यास बुझती थी और आज स्वयं प्यासी है। उस ढलान पर भी बहुत सारे जंगली पेड़ उगे हैं। लोगों की आवाजाही नहीं रहने के कारण यह क्षेत्र भी रहस्यमयी ही लगता है।


बहुत देर तक वह इधर उधर घूमकर खंडहर का निरीक्षण करते रहा। फिर वह एक जगह पर बैठकर सोचने लगा इसकी अंदरूनी बनावट और विशालता बता रही है कि यह अपने समय मे शानदार हवेली रही होगी। तभी उसको ध्यान आया , हो सकता है इंस्पेक्टर रवि को इसके इतिहास के बारे में जानकारी हो। उसने रवि का ध्यान किया और वह प्रगट हो गया।

आने के बाद रवि ने मुस्कुराते हुए पूछा कैसे याद किया और पहली रात कैसी रही? सत्यम ने सभी बातें उसको विस्तार से बता दी उसमे यह भी की वह यहाँ कैसे पहुँचा और इस वीरान खंडहर के बारे में आपको कुछ जानकारी है क्या ?

रवि - किसी जमाने में यह एक बड़े जमींदार की शानदार हवेली हुआ करती थी। आजादी की लड़ाई के समय क्रांतिकारियों के लिए यह गुप्त मंत्रणा का केंद्र हुआ करता था क्योंकि ठाकुर गजेंद्र सिंह अंदर से क्रांतिकारी का साथ देते थे लेकिन ऊपर से अंग्रेजों से भी अच्छे संबंध रखते थे। लेकिन उनका बेटा भावेश सिंह लंदन में पढ़ा लिखा अंग्रेजों का चमचा था। एक दिन कुछ क्रांतिकारी यहाँ छुपे थे उसकी सूचना उसने अंग्रेजों को दे दी। उसके बाद अंग्रेजों ने हमला करके सभी क्रांतिकारियों को मार दिया। उस हमले में गजेंद्र जी भी मारे गए। इस घटना की सच्चाई जब स्थानीय लोगों को ज्ञात हुआ तो लोगों ने हवेली को आग के हवाले कर दिया। उसके बाद भावेश सिंह कभी लौटकर यहाँ नहीं आया और यह शानदार हवेली वक्त के साथ खंडहर बन गयी।

सत्यम - लोग अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए देश से भी गद्दारी कर देते हैं ! ऐसे ही लोगों ने इतिहास और संस्कृति को कलंकित किया है।


रवि - इसमें कोई नई बात नहीं है। जो कुल्हाडी पेड़ को काटता है उसका हैंडल लकड़ी का ही बना होता है। लकड़ी को काटने में लकड़ी ही मदद करता है लेकिन दोष कुल्हाड़ी को दिया जाता है।

सत्यम - मुझे समझ में नहीं आता है कि लोग ऐसी नीचता क्यों करते हैं ।जो गलत है, अनैतिक है ,समाज के हित में नहीं है उसको भी भी निःसंकोच कर गुजरते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है ?

रवि - बुद्धि के कारण 

सत्यम - भला वो कैसे ?

रवि - मनुष्य भी एक दो पैर वाला जानवर है। लेकिन मनुष्य के अतिरिक्त किसी भी जानवर को तुमने खाना पकाते और नींद के लिए बिछावन लगाते देखा है ?

सत्यम - नहीं कभी नहीं!

रवि - स्वाद और नींद की तृष्णा ने मनुष्य के अंदर के जानवर को मारकर सार्वभौमिक विजेता बनने की होड़ में झोंक दिया।


सत्यम - मुझे समझ में नहीं आया , थोड़ा और स्पष्ट कीजिए।


रवि - मनुष्य को छोड़कर सभी जीवधारी की सक्रियता मात्र द्विस्तरीय होती है - प्राकृतिक और आंतरिक। वह अपनी बाहरी जरूरत के लिए प्रकृति पर निर्भर है जैसे जंगल, पहाड़ नदी, आकाश ,मिटी, वायु आदि। इनसे उसका स्वाभाविक अदान प्रदान चलता रहता है। शारीरिक स्तर पर उसकी सक्रियता का आंतरिक कारण भूख, भय और सेक्स होता है।

लेकिन मनुष्य ने सक्रियता का एक तीसरा स्तर विकसित कर लिया जिसको वैचारिक स्तर कहते हैं। इस स्तर को संतुष्ट करने के लिए उसने दौलत , देवता और देश बना दिया।


समस्या यहीं से शुरू हो गयी। प्राकृतिक संसाधन अब उसके अस्तित्व को बनाए रखने का साधन नहीं होकर दोहन करके दौलत बनाने की चीज हो गयी। सहजीविता समाप्त होती गयी और संघर्ष शुरू हो गया। दोहन को बढ़ाने के लिए लोगों को साथ जोड़ने के लिए देवता बना लिया और आधिपत्य के लिए देश बना डाला।

क्या जब कोई पंछी उड़ता है तो वह यह ख्याल रखता है कि वह किस देश के आकाश में उड़ रहा है। उसके लिए तो सारा आकाश एक ही है। क्या सिंधु नदी को मालूम है कि कब वह हिंदुस्तान की प्यास बुझा रही है और कब पाकिस्तान की। उसकी यात्रा तो अपनी यात्रा है। वैसे ही गंगा गंगोत्री से चलकर गंगा सागर पहुँचने में इसका हिसाब नहीं रखती की किसने उसको कितना अपवित्र किया। गाय को भी कहाँ ज्ञात होता है कि कौन उसको दूध के लिए चारा डाल रहा है और कौन मांस खाने के लिए।


सत्यम - आपने बहुत अलग बात कह दी। सारी समस्या इस तीसरे स्तर की है। नहीं तो हम भी अन्य जीवधारी की तरह खा पीकर मस्त रहते। आज उस कोबरा को देखकर लगा कि जब हम सकाय थे तो एक दिन भी जिंदगी का वो आनंद नहीं लिया होगा जो यह रोज ले रहा है।

अच्छा मुझे यह बताइए कि अकाय रूप में यदि हमको किसी जिंदा इंसान से बात करनी हो तो कैसे कर सकते हैं?

हम तो उसको देख लेते हैं उसको सुन भी लेते हैं , छू भी लेते हैं लेकिन उसको महसूस नहीं होता कि "मैं ही हूँ"। इसका कोई उपचार है क्या!


रवि - मैं तुमको आगाह कर राह हूँ इंसानों वाली हरकत करने की मत सोचना नहीं तो तुम्हारा यह ट्रांजिट टाइम नरकीय हो जाएगा और अगली यात्रा की भी परेशानी बढ़ जाएगी। यदि किसी तांत्रिक के हाथ लग गए तो तुमको बंदर की तरह अपने इशारे पर नचाएगा। 

अकाय रूप में तुम किसी सजीव को जब स्पर्श करोगे तो वह महसूस नहीं कर सकता। हाँ निर्जीव पदार्थ को तुम चाहो तो अपनी ताकत केंद्रित करके उसको उठाकर एक जगह से दूसरी जगह खिसका सकते हो। इसका प्रयोग तुम अपनी उपस्थिति महसूस कराने के लिए कर सकते हो।

सत्यम - आप जरा मुझे इसका प्रदर्शन करके बतावो।

इंस्पेक्टर रवि ने वहीं बैठे बैठे जमीन पर पड़े एक पत्थर को उठाकर उसके हथेली पर रख दिया। यह देखकर बंदर खों-खों करने लगा। थोड़ी देर में वहाँ विश्राम कर रहे पशु पंछी में हलचल तेज हो गई। इस पर रवि ने उसको बताया देखो बंदर को यह अस्वाभाविक लगा इसलिए उसने शोर करके सबको बात दिया। अब हम लोगों को यहाँ से दूर चलना चाहिए। हो सकता है यहाँ पर कोई तांत्रिक का मुखबिर हो। यदि ऐसा हुआ तो मुश्किल खड़ी हो सकती है।

फिर वह रवि को लेकर वैलंकिनी की पहाड़ी पर स्थित एक गुफा की तरफ चल दिया।


अकाय - पार्ट 5

रवि सत्यम को लेकर वायु मार्ग से वैलंकिनी के पहाड़ी पर पहुँचा। वैलंकिनी दो तरफ से नदी से घिरा एक मनोरम पहाड़ी है। जमीन की तरफ से इस पहाड़ी पर चढ़ाई अत्यंत दुर्गम है क्योंकि सीधी खड़ी पथरीली और नुकीली चट्टानें हैं। इसकी चोटी लगभग सपाट और जंगल से भरपूर है। यह पूरी पहाड़ी लगभग तीन किलोमीटर में फैला है। वैसे तो यह जगह सत्यम के घर से मात्र पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर है लेकिन कभी वह यहाँ पर नहीं आया था। केवल ट्रैकिंग करने वाले ही इधर आते थे क्योंकि इस पर किसी भी तरफ से चढ़ना कठिन काम था। उसको यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके शहर के इतना करीब और इतनी खूबसूरत जगह मानव दखल से अछूता अपने नैसर्गिक रूप में उपस्थित है।

सत्यम इस जगह की खूबसूरती को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। इसका ऊपरी हिस्सा घने जंगल से भरा था और इसकी दूसरी तरफ वाले क्षेत्र में हरी भरी ढलान और कहीं कहीं सपाट मैदान भी था। एक सपाट क्षेत्र से सटे गुफा के पास दोनो बैठकर जंगल की खूबसूरती का आनंद ले रहे थे तभी वहाँ से एक हिरण शावक कुलांचे भरता निकल गया। थोड़ी दूरी पर एक मोर नृत्य कर रहा था। बंदर भी एक डाल से दूसरी डाल पर उछल कूद कर रहे थे।

तभी सत्यम ने रवि से कहा यह जगह तो बहुत अच्छी है लेकिन आपने वहाँ से जल्दबाजी में निकलने को कहा और यह भी कहा की हमलोग किसी तांत्रिक के हाथ में पड सकते हैं। यह मुझे समझ मे नहीं आया और यहाँ ऐसा क्या है कि वह घटना यहाँ नहीं हो सकती है।


रवि - देखो , एक तो यह जगह दुर्गम होने के चलते आम लोगों की पहुंच से दूर है। दूसरी यह किसी सिद्ध महर्षि का श्रीक्षेत्र था जिसके चलते कोई अपवित्र आत्मा यहाँ नहीं आ पाती है।


सत्यम - यह पवित्र और अपवित्र आत्मा क्या होती है और इसका निर्धारण कौन करता है ?


रवि - प्रत्येक जीव जंतु का शरीर आत्मा के लिए एक वस्त्र की तरह है। हम दोनों की जो अवस्था है वह आत्मा की दृष्टि से निर्वस्त्र स्थिति है। इस स्थिति में तुम सामान्य जन की नजरों से अदृश्य हो लेकिन जिनके पास दिव्य दृष्टि है या जिसे पारलौकिक सिद्धि प्राप्त है उसके लिए तुम उतने ही आसान शिकार हो जितना अंडे से निकला पंखविहीन चूजा। सिद्धि प्राप्त तांत्रिक अकाय आत्मा को प्रलोभन देकर या भय दिखाकर अपने इशारे पर नचाता है। उससे गलत सही काम कराता है। कर्मविधान के अनुसार वह तुम्हारे प्रारब्ध में जुड़ता जाता है।


सत्यम - लेकिन यह सब कैसे होता है ? मैंने तो अभी तक आपके अतिरिक्त किसी भी आत्मा को नहीं देखा है और नहीं किसी तांत्रिक को। वो लोग कहाँ रहते हैं और उनसे संपर्क कैसे होता है?


रवि - सभी लोग वातावरण में वैसे ही उपलब्ध हैं जैसे टीवी चैनल के प्रोग्राम। तुम्हारे घर मे टीवी में लगभग दो सौ के ऊपर चैनल आता होगा। लेकिन तुम किसी समय पर एक ही चैनल देखते थे। लेकिन बाकी के चैनल की तरंगें भी वहाँ मौजूद रहती हैं लेकिन तुमको उसका आनंद लेने के लिए चैनल बदलना पड़ेगा। ठीक वैसे ही सबकुछ इस दुनिया में हो रहा है लेकिन आपको केवल उतना ही दिखता या समझता है जिससे आपका कुछ लेना देना है। यदि आपका किसी से कुछ भी लेन देन बाकी नहीं होगा वह आपके संपर्क में नहीं आ सकता। संपर्क की बात छोड़ो वह आपके सपने और सोंच में भी नहीं आ सकता है। जो आपके जितना करीबी है , समझ लो उससे आपका उतना ही बड़ा हिसाब चुकता होना बाकी है।

यात्रा तो शरीर का समाप्त होता है , आत्मा की अनवरत यात्रा में जीवधरी का शरीर एक पड़ाव है , एक साधन है पिछले एकाउंट को सेटल करने का और प्रारब्ध को सुधारने।

कोई भी मनुष्य या जीव इस दुनिया मे नहीं खाली हाथ आता है नहीं खाली हाथ जाता है। क्योंकि उस शरीर की यह नई यात्रा है उस आत्मा की नहीं। अतः उसके पिछले जन्मों का पाप पुण्य उसके साथ ही रहता है और इस शरीर से जो भी करेगा वह आगे जाएगा। यदि ऐसा नहीं होता तो एक ही माँ के गर्भ से एक ही साथ पैदा हुए समरूप जुड़वा भाई का नसीब भी एक जैसा ही होता। जो कि कभी भी नहीं होता है।

यह अकाय अवस्था भी उस आत्मा की अनवरत यात्रा का एक पड़ाव है इसलिए तुम्हारी कोशिश होनी चाहिए कि तुम्हारा बैलेंस शीट खराब नहीं हो। यह अवस्था भी सबको नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त किसी भी रूप में तुमको अपना पिछला जन्म याद नहीं रहता लेकिन तुमको अपने पिछले जन्मों के किए का परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है। तुम अपना ही उदाहरण ले लो मालूम नहीं किस जन्म के तुम्हारे कर्मों का फल था कि तुम्हारी इतनी दर्दनाक मौत हो गई , हॉस्पिटल तक पहुंचने का मौका नहीं मिला।


सत्यम - यह बात तो आप एकदम सही कह रहे हो। करीबी रिश्तेदार से ज्यादा ही लेनदेन बाकी रहता है। यह बात उतनी स्पष्ट नहीं हुई।


रवि - हर माँ अपने बच्चे को पालने में जो कष्ट उठती है ,शारीरिक ,आर्थिक और मानसिक, उसका कोई भी मूल्य नहीं चुकाया जा सकता है। साथ में यह भी नहीं मालूम कि उसकी संतान कैसी निकलेगी और उसके साथ कैसा व्यवहार करेगी। बेटा या बेटी के रूप में वही आत्मा पैदा होती है जिसको आपसे बड़ा लेनदेन बाकी हो , वो अच्छा निकले तो भी और बुरा निकले तो भी।

किसी महात्मा ने अपने सत्संग में एक कहानी बताया था। एक साधु रात्री विश्राम के लिए एक जगह ठहरे। वो अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाते थे ,किसी और के घर का बना भोजन नहीं खाते थे। उन्होंने आटा गूंधा और बाटी चोखा बनाया। थोड़ी दूरी पर एक कुत्ता बैठा था। वह सोचने लगा साधुजी के खाने के बाद जो बचेगा वो मुझे मिलेगा। लेकिन साधु जी ने जो भी बनाया सब खा गए। कुत्ता थोड़ा निराश हुआ। फिर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी। ललचाई नजर से साधु को बर्तन धोते देख रहा था और सोंच रहा था यह बर्तन धोकर हटें तो जो जूठन गिरा होगा उसी को खाकर संतोष कर लूँगा। लेकिन कुते का इस तरह से मंडराना और देखना साधु को पसंद नहीं आयी। उसने चिमटा चलाकर कुते को मारा जिससे उसकी कमर टूट गयी। कुछ दिनों बाद उसी कारण से वह मर गया। वहाँ के बही खाता में यह पाया गया कि वह निर्दोष है। अतः उससे पूछा गया कि तुम साधु को क्या दंड देना चाहते हो , कुते ने कहा कि उनको माफ कर दिया जाए। चित्रगुप्त जी ने कहा कर्मविधान में माफी का कोई प्रवधान नहीं है। तुम्हारी इच्छा इसलिए पूछी जा रही है क्योंकि तुम बेकसूर थे। कुते ने कहा यदि ऐसा है तो मुझे अगले जन्म में उनका बेटा बनाकर भेजो और जब मैं बीस साल का गबरू जवान हो जाऊं तो अपने पास बुला लेना ताकि उनकी भी कमर वैसे ही टूट जाए जैसे मेरी टूटी थी।


सत्यम - अरे बाप रे ! इसका मतलब तो यह हुआ कि जिसने मुझे टक्कर मारा और जिसने कुचल दिया उनकी कोई गलती नहीं थी। उनका मेरे से कुछ लेनदेन बाकी रहा होगा !


रवि - संभव है, अब इस घटना पर दो तरीके से सोंचा जा सकता है, चलो दो लोगों से मेरा बड़ा एकाउंट सेटल हो गया। अगली यात्रा में ऐसी दुर्घटना नहीं घटेगी और दूसरी सोंच यह हो सकती है कि उन लोगों की गलती से मेरा सबकुछ खत्म हो गया। भरी जवानी में मेरी मृत्यु हो गयी और उसके चलते मेरी माँ भी चल बसी।

दोनो ही सोंच अपनी जगह सही है और दोनों का आपके बैलेंस शीट में अलग क्रेडिट डेबिट होगा। बिज़नेस में तो हर साल 31 मार्च आता है और आपको बैलेंस शीट बनाना पड़ता है। लेकिन जिंदगी का 31 मार्च कब आएगा यह मालूम नहीं होता है। उस दिन यदि आपके बैलेंस शीट की जो भी अवस्था हो -पॉजिटिव या निगेटिव - वही लेकर आपकी आत्मा का नई काया में प्रवेश होता है। नए जीवन में उसी हिसाब से आपको सुख दुख मिलता है।

मान लो कि कर्मविधान के अनुसार यह तय हो गया कि अगले जन्म में तुमको कुत्ता बनना है। अब तुम्हारे बैलेंस शीट की क्रेडिट डेबिट एंट्री तय करेगी कि किसका कुत्ता बनना है - गली का कुत्ता, कैटरीना का कुत्ता या अमेरिका के प्रेसीडेंट का कुत्ता। तीनो परिस्थिति मे मिलने वाली जिंदगी अलग होगी। एक मे हर कोई दूर-दूर करेगा ,एक में कैटरीना के गोद में बैठकर उसका गाल चाटने को मिलेगा , एक में नौकरों की फौज तुम्हारी सेवा में खड़ी मिलेगी। लेकिन लोग कुत्ता ही कहेंगे। 

मुझे ऐसा लग रहा है कि यह जगह तुमको बहुत पसंद आ रही है। तुम इसका आनंद उठावो तबतक मैं एक जरूरी काम निबटाकर आता हूँ।


रवि के जाने के बाद सत्यम पहाड़ी के ऊपर फैले जंगल में घूमने लगा। तभी हिरण का बच्चा फिर उधर से गुजरा। उसको लगा काश मैं भी हिरण होता ऐसे ही मस्ती में कुलांचे भरता। तभी उसको यमदूत की कही बात का ध्यान आया कि वह किसी भी शरीर में प्रवेश कर सकता है। उसने तुरंत अपना ध्यान केंद्रित किया और हिरण शावक के अंदर प्रवेश कर गया। फिर क्या था दौड़ दौड़कर पूरे क्षेत्र का भ्रमण किया। वह हिरण की तरह हरकत कर सकता था और मनुष्य की तरह सोंच सकता था, महसूस कर सकता था। उसको बहुत आनंद आ रहा था। अपनी मस्ती में वह भूल गया कि पाँच मिनट की समय सीमा कब पार कर गयी।

समय का ध्यान आते ही वह तुरंत उसके शरीर से बाहर आ गया। उसके मन में यह शंका होने लगी कि ज्यादा समय हिरन के शरीर में रहने के चलते कहीं उसकी यह क्षमता वापस तो नहीं चली गई। इस बात को जाँचने के लिए वह सामने के एक पेड़ पर बैठे बड़े से जंगली तोते के शरीर में प्रवेश किया। उड़कर पेड़ की सबसे ऊँची डाल की पुतलूंगी पर बैठकर झूला और मीठे फल का स्वाद भी चखा। लेकिन पाँच मिनट के अन्दर ही उसके शरीर से बाहर निकल आया।

अब वह सोंचने लगा कि फिर पांच मिनट की मर्यादा का क्या मतलब है ? इस प्रश्न का उत्तर तो केवल यमदूत ही दे सकते हैं। उसने उनका आह्वान किया। यमदूत तुरंत प्रगट हो गए। सत्यम ने उनसे पूछा कि आपने कहा था कि मैं किसी भी शरीर में मात्र पाँच मिनट ही रह सकता हूँ , लेकिन मैं तो हिरण के शरीर में घंटों रहा। यह कैसे हुआ ? 

मुझे आपसे और भी बातें पूछनी है।


यमदूत - मेरी पाँच मिनट वाली बात सही है। लेकिन वह पाँच मिनट देवलोक का था ना कि पृथ्वी लोक का। देवलोक का पाँच मिनट तुम्हारे यहाँ पर लगभग एक सप्ताह के बराबर होता है। अतः तू किसी भी परकाया में सातवां सूर्योदय नहीं देख सकते। समय निकट आने पर तुमको असहज महसूस होने लगेगा। यह बात तुम्हारे लिए संकेत होगा कि तुमको अब इस काया से बाहर निकलना है।


सत्यम - आप देवलोक जाते हैं और वहाँ देवता से मिलते है ?


यमदूत - हाँ, बिल्कुल जाता हूँ। हमलोगों का मंथली रिव्यु मीटिंग रहता है। उसमे यहाँ पर हो रहे बदलाव और उसके प्रभाव का आकलन किया जाता है उसके आधार पर आगे की कार्य योजना बनती है।


सत्यम - मनुष्य भगवान को परमपिता मानता है और उसको ही अपना भाग्य विधाता मानता है। यदि यह सत्य है तो कोई पिता अपने संतान के भाग्य में दुःख कैसे डाल सकता है ? यदि मैं भी उनकी संतान था तो मुझे ऐसी मौत क्यों मिली ?

यमदूत - तुम्हारी जानकारी अर्धसत्य है। देवता विधाता हैं, भाग्य विधाता नहीं हैं। वो केवल विधान बनाते हैं और हर विधान की अपनी मर्यादा होती है। मर्यादा का अतिक्रमण कष्ट का निमंत्रण और उसका अनुपालन सुख का कारक होता है।

इस संसार मे जो भी होता है वह भगवान की मर्जी नहीं है। सब जीवधरी के व्यक्तिगत और सामूहिक कृत्य का प्रतिफल है। विधाता ने तो पेड़ पौधे छाया ,फल और प्राणवायु के लिए बनाया। लेकिन मनुष्य ने उसका अनुचित दोहन किया। फिर उसका परिणाम भी तो भुगतना ही पड़ेगा। पहाड़ भी बनाने के पीछे कुछ खास उद्देश्य था लेकिन मनुष्य ने उसको भी नहीं छोड़ा। यह पूरा ब्रह्मांड एक जटिल स्वचालित तंत्र है जो पूर्ण रूप से एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। भले ही देखने में चाँद तारों की दूरी दिखे, समंदर की गहराई दिखे, आकाश की विशालता दिखे, धरती का विस्तार दिखे या वायु का प्रवाह दिखे। सभी जीव जंतु और कीड़े मकोड़े सबकी अपनी भूमिका है। एक का कर्तव्य दूसरे का अधिकार बन जाता है और इसी विधान से सबका संचालन होता है। जैसे ही अतिक्रमण सीमा के बाहर पहुँचती है तो जो घटना घटती है उसको सामान्य समझ वाले अनहोनी का नाम देते है।


अकाय - पार्ट 06


सत्यम गहन सोच में पड़ गया। जब भाग्य भगवान नहीं लिखता है तो कौन लिखता है? उसने यमदूत से प्रश्न किया कि फिर मनुष्य के जीवन में जो कष्ट आता है उसका जिम्मेदार कौन है ? फिर लोग क्यों कहते हैं कि जो भी होता है वह भगवान की मर्जी से होता है और उसमे कोई बदलाव नहीं हो सकता है ?


यमदूत - देखो , भाग्य भगवान नहीं लिखते हैं। परमसत्ता ने उनको यह जिम्मेदारी दे रखी है कि वह प्रत्येक कर्म का यथोचित प्रतिफल दे। कर्म उस आत्मा का वह जीवधारी स्वरूप करता है। अतः अपने भाग्य का निर्धारण आप स्वयं करते हैं। सत्कर्मों द्वारा कालांतर में यही आत्मा देवत्व को प्राप्त होता है जिसको मोक्ष कहते हैं। मनुष्य रूप में लोग अलग अलग भूमिका जैसे डॉक्टर , इंजीनियर, वकील ,नेता आदि के रूप में अपनी जीवन यात्रा पूरी करते हैं। उनके द्वारा निष्पादित नैतिक - अनैतिक क्रियाकलाप उस आत्मा की आगे की यात्रा को सुगम या कठिन बनाता है। आप यह समझ लो जो किया था वह भोग रहे हो और जो कर रहे हो वह भोगना पड़ेगा - अभी नहीं तो आगे कभी। हमेशा ध्यान रखना यात्रा शरीर की समाप्त होती है आत्मा की नहीं।

सत्यम - फिर मुझे यह बताइए आदमी मरता क्यों हैं ? मर गया मतलब सबकुछ खत्म ,सब हिसाब बराबर। लेकिन कोई पैदा होते ही मर जाता है, कोई भरी जवानी में मरता है और किसी किसी के मृत्यु के लिए दुआ माँगनी पड़ती है। ऐसा क्यों ?

यमदूत - तुम्हारा प्रश्न सरल और स्वाभाविक है। लेकिन इसका उत्तर जटिलतम है। कोई भी जीवात्मा तबतक नहीं मरती जबतक उसके लिए उपयुक्त नवीन खोल की व्यवस्था नहीं हो जाती है या अपने उस आत्मा से कर्मा एकाउंट को सेटल नहीं कर लेता जो अगले जन्म में उससे मिलने वाला नहीं है।

तुमको बहुत सारे लोग ऐसे मिल जाएंगे जिनकी खुद की जीने की इच्छा समाप्त हो गयी है और संपर्क वाले भी चाहते हैं कि वह मर जाए। लेकिन उसको यों ही निरर्थक जीवन जीना पड़ता है।

महाभारत में एक प्रसंग आता है, जब पितामह भीष्म बाणों की सेज पर पड़े हैं और उनसे मिलने कृष्ण आते हैं। पितामह ने कृष्ण से पूछा मैं यह किस जन्म की सजा भुगत रहा हूँ ? मैंने यहाँ पड़े पड़े अपना पिछला चौहत्तर जन्म देख लिया लेकिन किसी मे भी मैंने ऐसा पाप नहीं किया था जिसकी इतनी कठोर सजा मिले। कृष्ण ने उनका हाथ अपने हाथ मे लेकर कहा आपसे पचहत्तरवें जन्म में वो पाप हुआ था जिसका यह परिणाम है। आप एक बहेलिया के बेटे थे और आपके घर के सामने चिड़िया के घोंसले से नवजात बच्चा नीचे गिर गया। आप बचपना के कौतूहल में उसको बबूल का कांट चुभो रहे थे वो छटपटा रहा था और आप आनंदित हो रहे थे। जब आपका मन भर गया तो आपने उसको बबूल की झाड़ी में फेंक दिया। वहाँ वह कांटों में फंसकर जिस वेदना से मरा उसी का यह प्रतिफल है।

तुमने अखबार में पढ़ा होगा कुछ ही साल पहले की घटना है। केम हॉस्पिटल में एक नर्स उन्नचालिस साल से कोमा में थी। जब वह इक्कीस साल की थी तो उसका बलात्कार हुआ था और उसके बाद वह कोमा में चली गई थी। वह इतनी लंबी अवधि तक कोमा में रही लेकिन मरी नहीं क्योंकि उसके उपयुक्त कोई खोल तैयार नहीं था। उसको इतने सालों तक स्टाफ से सेवा करानी थी क्योंकि उसके घर वालों ने उसका त्याग कर दिया था। यदि कुछ अचानक हो जाए ,जैसा तुम्हारे साथ हुआ है, तो आत्मा को इस लोक में तबतक भटकना पड़ेगा जबतक उपयुक्त खोल नहीं तैयार होता। फिर भी आत्मा का कर्मा एकाउंट चलता ही रहेगा। यह पल भर के लिए भी नहीं रुकता है। नई यात्रा उस आत्मा को बोझ नहीं लगे इसके चलते उसको फॉर्मेट कर दिया जाता है। कुछ लोग इतनी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं कि वो अपने पिछले जन्म को भी रिट्रीव कर लेते हैं।


सत्यम - लेकिन आजतक तो मैंने यही सुना है कि भगवान की इच्छा के बिना एक पता भी नहीं हिलता और वह सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। ब्रह्मा का लिखा कोई मिटा नहीं सकता है।


यमदूत - किसी भी कंपनी का चीफ एग्जीक्यूटिव उस कंपनी में सर्वशक्तिमान होते हुए भी कोई भी काम नियम विरुद्ध नहीं कर सकता है। क्योंकि नियमपालन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसकी होती है जो नियंता की भूमिका में होता है। यदि वही नियम तोड़ने लगेगा तो नियम की पवित्रता ही खत्म हो जाएगी। इसलिए नियामक ने हर आत्मा के भाग्य में सिर्फ एक ही बात लिखा है कि "आप अपना भाग्य स्वयं लिख सकते हैं"।

प्रभु श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार थे, ऐसा सभी जानते हैं और मानते भी हैं। लेकिन जब वनवास मिला तो उसे भी स्वीकार किया पत्नी चोरी हो गई तो उसकी खोज में दर-दर भटके। रोते हुए सभी पशु पंछी से खोज में मदद ली। उन्होंने कहीं भी नियमों का अतिक्रमण नहीं किया। उनके लिए सीता का पत्ता लगाना तो चुटकी बजाने भर का काम था। लेकिन मानवीय खोल में वह वैसा नहीं कर सकते थे। उन दोनों भाइयों से गलती हुई कि एक अकेली औरत को जंगल मे अकेला छोड़ दिया और उसका अपहरण हो गया। यदि लक्ष्मण जी वहाँ से नहीं गए होते तो रामायण की कथा कुछ और होती। अब सोंचो पत्नी के अपहरण की पटकथा राम के नसीब में किसने लिखी - राम ने या ब्रह्मा ने !!

हाँ ,आपके हर कर्म का उचित प्रतिफल मिले यह नियंता का कर्तव्य है। इसमे वह कभी चूक नहीं करता है। आपके प्रत्येक गतिविधि का वह रिकॉर्ड रखता है। यहाँ तक कि आपके मन में उठने वाले विचार का भी उसके पास हिसाब रहता है।

सत्यम - यह क्या बात हुई ! मन में तो हमेशा कुछ ना कुछ विचार आते रहता है। उसमें उल्टा- पुल्टा , सही - गलत सब शामिल है। क्या वह भी काउंट होगा ?

यमदूत - देखो, किसी भी काम की शुरुआत विचार से ही होती है चाहे वह सही हो या गलत हो। विचार ही वाणी एवं व्यवहार में बदलता है और व्यवहार स्वभाव बन जाता है। किसी की भी पहचान उसके स्वभाव से होती है। विचार एक जीवंत ऊर्जा है जिसमें असीम संभावना है। इसीलिए कहा जाता है कि मन, वचन और कर्म से समर्पित होकर किए गए कार्य में सफलता अवश्यम्भावी है।

सत्यम - इसका मतलब तो यह हुआ कि सारी समस्या की मूल और समाधान विचार की प्रकृति पर निर्भर करता है। लेकिन विचार पर तो कोई ना ही विचार करता है और ना ही नियंत्रण रहता है। मालूम नहीं कहाँ से और कैसे-कैसे विचार आते रहते हैं।

यमदूत - बिल्कुल सही बात है। औसतन मनुष्य के मन में प्रतिदिन चौसठ हजार विचार आते हैं - नए पुराने मिलाकर। लेकिन सतत अभ्यास से मन में आने वाले नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण करके अपने क्रेडिट बैलेंस में वृद्धि की जा सकती है।

सत्यम - आखिर वो कैसे हो सकता है?

यमदूत - बहुत आसान है। नकारात्मक विचार आते ही उसे तत्क्षण अस्वीकार्य कर दो। हमेशा अपनी सोंच सकारात्मक रखो। दिन में एकबार यह संकल्प करो की "मेरे किसी भी क्रियाकलाप से किसी भी जीवात्मा को कोई कष्ट पहुँचा हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। यदि किसी भी जीवात्मा ने मुझे कष्ट पहुँचाने का प्रयास या विचार किया हो उसे मैंने क्षमा किया।"

प्रतिदिन मात्र इस संकल्प को सच्चे मन से दोहराने से आपके जीवन में और वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा जिससे आपके संबंध और व्यवहार में बदलाव महसूस होगा।

सत्यम - काश ! मैं जब जिंदा था तो यह बात मुझे किसी ने बताया होता , मैंने भी आगे की यात्रा के लिए और क्रेडिट बैलेंस अर्जित किया होता।

यमदूत - कोई बात नहीं, कोशिश करना कि अकाय अवस्था में कुछ भी गलत काम नहीं हो। यह तो ज्ञात नहीं कि तुमको इस अकाय रूप में कितना समय व्यतीत करना पड़े।

तभी उनका एंटीना ब्लिंक करने लगा। उन्होंने अपने बाजू पर लगे टच पैड पर कुछ किया और सत्यम से बोला "अब मुझे निकलना पड़ेगा। चलो फिर कभी मिलेंगे।"

इतना कहकर यमदूत जी अन्तर ध्यान हो गए।


अकाय - पार्ट07


यमदूत के प्रस्थान करने के बाद सत्यम यह विचार करने लगा भगवान ने क्या चाक चौबंद व्यवस्था बनाई है। अपने प्रारब्ध के अतिरिक्त आप कुछ भी लेकर आ नहीं सकते और अपने कर्मफल और संस्कार के अतिरिक्त कुछ लेकर जा नहीं सकते। कहीं पर कोई पुलिस नहीं , किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं , ऊंचाई छूने के लिए खुला आकाश और नीचे गिरने के लिए अंतहीन रसातल। सकारात्मक और नकारात्मक विकल्प अपनाने की स्वायत्तता , क्यों कर रहे हैं उससे भी अनजान और क्या अंजाम होगा उससे भी अनजान। करने की तो बात दूर , सोंचने मात्र से भी क्रेडिट डेबिट बैलेंस प्रभावित होता है।

अच्छा हुआ मुझे अकाय की अवस्था मिली और इतनी बहुमूल्य जानकारी प्राप्त हुई। अब मैं सोचकर सोचूँगा की क्या सोंचना है। अगली बार जब यमदूत जी से मुलाकात होगी तो उनसे प्रारब्ध को सुधारने का टिप्स अवश्य लूँगा।

अकस्मात उसकी नजर एक सफेद कबूतर पर पड़ी जो अपनी ही धुन में मस्त गुटर गूँ करता हरी घांस पर टहल रहा था। बरसात में पहाड़ के ढलान पर उगी घास के कुछ भाग पर सूरज की रोशनी पड रही थी और कुछ भाग पर पेड़ की छाया जिसके चलते यह हिस्सा गोल्फ कोर्स के टर्फ जैसा लग रहा था। सत्यम को लगा काश वह भी कबूतर होता और इसके साथ गुटर गूँ करता। तभी उसके ध्यान में आया इसमे काश की क्या बात है अभी इसके शरीर मे प्रवेश करके मटरगस्ती कर लेता हूँ।


सत्यम , यमदूत प्रदत्त अपनी विशेष शक्ति का प्रयोग कर उस कबूतर के शरीर मे प्रवेश कर गया। कुछ समय तक वहीं फुदकते रहा फिर उड़ चला। उड़ते हुए वह पहाड़ी से लगकर बहती नदी के ऊपर मंडराने लगा। उड़ते हुए जो विहंगम दृश्य उसको दिखाई दे रहा था वह बड़ा ही रोमांचकारी था। कुछ पंछियों का झुंड कलरव करता नदी की लहरों पर उतर जाता ,क्षणिक जलक्रीड़ा करता और उड़ लेता। सकाय रहते उसने कभी भी ऐसे मनोहारी दृश्य का आनंद नहीं लिया था। 

कलकल करती बहती नदी की धार, नदी के एक तरफ हरी भरी पहाड़ी और दूसरी तरफ दूर तक फैला मैदान। शायद हवाई जहाज की खिड़की से धरती ऐसी ही दिखती होगी। इसका आनंद लेने के लिए वह कभी एकदम नदी जलतल के करीब से गुजरता कभी ऊँची उड़ान भरता। एक बार वह नीचे उतर रहा था तो देखा कि जल के साथ से उड़ान भरते एक पंछी के झुंड पर बड़े मगरमच्छ ने हमला कर दिया। लगभग पांच फीट की छलांग मारकर उसने चिड़िया को पकड़ा था। मानवीय मन के लिए तो यह अद्भुत नजारा था लेकिन कबूतर मन यह देखकर डर गया। अब नदी के सतह के करीब जाने में डरने लगा। लेकिन सत्यम मगरमच्छ को प्राकृतिक परिवेश में थोड़ा और करीब से देखने की चाह को रोक नहीं पा रहा था। थोड़ी दूरी पर एक छोटी डोंगी में सवार दो युवक उसी तरफ बढ़े आ रहे थे जिधर वो मगरमच्छ था। देखने मे दोनो मछुआरा परिवार के लग रहे थे और उनके डोंगी में एक जाल भी रखा हुआ था। एक लड़का चपु चला रहा था और दूसरा वंशी जैसी चीज जिसमें मांस का टुकड़ा फंसाया था , बार-बार पानी के अंदर डाल -निकाल रहा था। सत्यम को उस लड़के की यह गतिविधि उसके समझ से परे थी। शायद वह किसी बड़ी मछली की उम्मीद में यह कर रहा था। वह लड़का मगरमच्छ की उपस्थिति से अनभिज्ञ था। जैसे ही वह मगरमछ के करीब पहुँचा मांस के टुकड़े का गंध शायद उसको मिल गया। अचानक उस विशालकाय मगरमच्छ ने मांस के टुकड़े के पर झपटा मारा। वह मांस का टुकड़े को तो अपने जबड़े में नहीं ले पाया लेकिन इस अप्रत्याशित घटना से वह लड़का घबड़ा गया और उसका संतुलन बिगड़ गया। वह नदी में गिर पड़ा। चपु चलाने वाले लड़के ने केवल आवाज सुनी थी घटना होते नहीं देखा था। मगरमच्छ के पूंछ के प्रहार से डोंगी भी असंतुलित हुई थी। उसने मुड़कर देखा तो उसकी नजर विशालकाय मगरमच्छ और अपने दोस्त संतु पर पड़ी। इधर अंसतुलित डोंगी भँवरी की तरफ मुड़ चुकी थी। डोंगी नहीं संभाले तो भँवरी में फंसना तय था और मगरमच्छ से बचने में वह संतु की कोई मदद नहीं कर सकता था। खतरा को भांपकर संतु ने डुबकी लगाई और दूर भागने की कोशिश की। लेकिन मगरमच्छ तो पानी का अजेय शिकारी होता है। उसने तुरंत संतु का पैर अपने जबड़े में जकड़ लिया। उसका दोस्त डोंगी को भँवर में फसने से बचाने की कोशिश कर रहा था। वैसे भी वह मगरमच्छ के जबड़े से अपने दोस्त को बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकता था। यह सारी घटना अचानक और इतनी तेजी से घटी की किसी को कुछ भी सोंचने और प्रतिक्रिया करने का वक्त नहीं मिला। कबूतर बना सत्यम सोंच रहा था कि उस लड़के को मगरमच्छ के जबड़े से कैसे निकाला जाए। उसको कुछ सूझ नहीं रहा था और ज्यादा सोचने का समय भी नहीं था। तभी उसके दिमाग में यह बात आई कि अभी संतु को कोई बचा सकता है तो केवल और केवल वह मगरमच्छ ही बचा सकता है। अकाय सत्यम ने एक अप्रत्याशित निर्णय लिया। वह कबूतर के शरीर से निकलकर मगरमच्छ के शरीर में प्रवेश कर गया। तबतक संतु को मगरमछ गहरी पानी में खींच चुका था और उसका दाहिना पैर पूरा उसके जबड़े के अंदर था। मगरमच्छ के शरीर मे घुंसते ही उसके पैर को छोड़ दिया। लेकिन वह इतनी गहरे पानी मे पहुँच चुका था कि दम घूँटने से वह बेहोश हो चुका था। अपने से वह ऊपर नहीं जा सकता था। मगरमच्छ बना सत्यम उसे पीठ पर लेकर पानी के ऊपर आया। तबतक उसके दोस्त ने डोंगी को भँवर में फंसने से बचा लिया था और तेजी से चपु चलाता अपनी घर की तरफ बढ़ रहा था। इस घटना का भय उसके चेहरे पर झलक रहा था। अचानक मगरमच्छ के पीठ पर पड़े संतु को देखकर वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। समझ मे नहीं आ रहा था उसको क्या करना चाहिए। मगरमच्छ डोंगी के तरफ ही बढ़ा चला आ रहा था। उसके पीठ से संतु को खिंचने की हिम्मत उसके दोस्त में नहीं थी। तभी मगरमच्छ बने सत्यम ने ऐसा उछाल मारा की बेहोश संतु सीधा डोंगी में गिरा। यह देखकर उसका दोस्त हक्का बक्का राह गया। उसको तो चपु चलाने का भी होश नहीं रहा। इधर सत्यम सोच रहा था की इसको कैसे किनारे पहुंचाया जाए ताकि संतु का उपचार हो और उसकी जान बच सके। वह उसके दोस्त की मनोदशा का अनुमान लगा सकता था। फिर मगरमच्छ बने सत्यम ने डोंगी को अपने पीठ के ऊपर लिया और बस्ती के नजदीक नदी के किनारे छोड़ आया। तबतक उसका दोस्त भी बेहोश हो चुका था। नदी की तरफ आए एक आदमी की नजर डोंगी में बेहोश पड़े बच्चों पर पड़ी तो उसने चिल्ला कर और लोगों को बुलाया। फिर उन दोनों को उतारकर वो लोग अपने साथ ले गए।

अब सत्यम ने मगरमच्छ के मन से नियंत्रण हटा दिया लेकिन उसी के शरीर में था। मगरमच्छ धीरे धीरे गहरे पानी में उतरकर नदी के बीच मे स्थित टापू की तरफ चल दिया। सत्यम ने सोचा चलो कुछ और देर मगरमछ की जिंदगी को करीब से देखते हैं। उसको देखते ही अन्य जलचर अपना रास्ता बदल लेते थे। झुंड में तैरने वाली मछलियां तीतर-बितर हो जातीं थी। यह मगरमच्छ के खौफ को दर्शाता था।

टापू पर पहुँचते ही उसका सामना मादा मगरमच्छ से हुआ। दोनो के बीच कुछ संवाद हुआ जिसको सत्यम नहीं समझ पाया। दोनो ने एक दूसरे के ऊपर अपने पूँछ से टक्कर मारा। शायद यह उनके अभिवादन का तरीका हो क्योंकि दोनो एक दूसरे के साथ सहज ही दिख रहे थे। फिर दोनो एक साथ चलकर एक जगह पर रुक गए। मादा ने बड़े नजाकत से बलभीस मिट्टी को अपने अगले पंजे से कुरेदना शुरू किया। थोड़ी देर में ही बहुत सारे वहाँ छुपे अंडे दिखने लगे। फिर एक-एक कर उन अंडों से मगरमच्छ के बच्चे बाहर आने लगे। अंडे से बाहर निकलते मगरमच्छ के बच्चों को देखना सत्यम के लिए एकदम अनूठा अनुभव था। बाहर निकलते बच्चों को मादा मगरमच्छ ने अपने जबड़े में भर लिया। फिर तेजी से नदी में उतरकर उनको पानी में छोड़ दिया। तबतक नर मगरमच्छ अंडे से निकलने वाले अन्य बच्चों की निगरानी कर रहा था। मादा मगरमच्छ फिर लौटकर आयी और बाकी बच्चों को अपने जबड़े में भरकर नदी में उतर गयी। उसके पीछे पीछे सत्यम भी पानी मे उतर गया। सत्यम यह देखकर हैरान था कि जिस जबड़े में फंसकर हाथी भी मजबूर हो जाता है उस जबड़े सत्ताईस सेंटीमीटर के नन्हे मगरमच्छ कितने सकुन से थे और सुरक्षित महसूस कर रहे थे। शायद यही माँ के प्यार और संरक्षण का कुदरती नियम है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार मात्र दो से तीन प्रतिशत मगरमच्छ वयस्क अवस्था तक पहुँच पाते हैं। क्योंकि जलथल दोनों में इस खूंखार शिकारी के जन्मजात और स्वभाविक दुश्मन विचरण करते हैं जिनको इनकी जनसंख्या वृद्धि से खतरा है। कुछ भी हो बच्चे सभी मासूम ही होते हैं, भले ही वो मगरमच्छ के ही क्यों न हों।

फिर नर-मादा दोनो एक साथ गहरे पानी मे एकसाथ उत्तर गए और मादा ने एक बड़ी मछली का शिकार नदी के तलहटी में किया। दोनो ने उसको खाया फिर उस पहाड़ी की तरफ चल दिए। पानी के नीचे पहाड़ की तलहटी में कंद्रा जैसा उनका खूबसूरत हाईड आउट बना था। प्रकृति ने शायद उनके लिए स्वयं इतना खूबसूरत और सुरक्षित घर बनाया हो। सत्यम उस ठिकाने को प्रशंशा भरी दृष्टि से निहारता रहा। जब दोनो आँखे बंद कर विश्राम करने लगे तो सत्यम मगरमच्छ के शरीर से निकलकर वैलंकिनी की पहाड़ी पर वापस आ गया।

वह पलकें बंद कर आज के घटित घटना पर विचार कर रहा था। प्रत्येक जीवात्मा का जीवन संघर्षमय ही है। आज उसके चलते एक मगरमच्छ को उसके भोजन से वंचित होना पड़ा। लेकिन उसको इस बात का संतोष था कि उसने एक बच्चे की जान बचाई।

वह ध्यानमग्न था तभी इंस्पेक्टर रवि ने पूछा "मैं कब से तुमको ढूंढ रहा था लेकिन तुम न तो दिख रहे थे नहीं तुम्हारा सिग्नल आ रहा था। मैं पहाड़ी का कोना कोना छान मारा। मुझे तो यह डर सताने लगी थी कि कहीं तुम किसी तांत्रिक के हाथ तो नहीं लग गए।"

यह सुन हँसते हुए सत्यम ने कहा, " अभी तक तो नहीं , आगे का पता नहीं। यह अकायपन हर रोज एक नया आयाम दिखा रही है। कल की बात कल ही जाने।"

फिर उसने आज की पूरी रामकहानी सुना दी। सभी बातें जानकर रवि भौंचक हो गया।


अकाय - पार्ट 08


सत्यम ने रवि से पूछा आपको हमेशा क्यों ऐसा लगता है कि कोई तांत्रिक मुझे अपने गिरफ्त में ले लेगा। लगता है आपका किसी तांत्रिक का व्यक्तिगत अनुभव है।

रवि ने गहरी साँस लेते हुए कहा तुम्हारा अनुमान गलत नहीं है। यह घटना उस समय की है जब मैं एक देहाती क्षेत्र का थानाध्यक्ष था। उस समय एक विचित्र केस मेरे सामने आया। सुजातपुर गाँव मे दो भाई थे ,धर्मपाल सिंह और महिपाल सिंह। दोनों भाइयों में बडा ही प्यार था और उनका परिवार एक सम्पन्न खुशहाल किसान परिवार था। धर्मपाल जी से मेरी व्यक्तिगत जान पहचान हो गयी थी। वो अक्सर अपने खेत में उगी सब्जियां मेरे को दे जाते थे और पर्व त्योहार में भी कुछ ना कुछ मिठाई पकवान पहुँचा देते थे। वहाँ पर मैं बैचलर ही रहता था। अपने परिवार को डिस्ट्रिक्ट टाउन में रखा था क्योंकि थाने पर सुविधा अच्छी नहीं थी।

एक रोज हॉस्पिटल से फोन आया कि दो औरतों को बहुत बुरी तरह पीटा गया है और यह पुलिस केस बनता है। बिना पुलिस की अनुमति के डॉक्टर इलाज करने को तैयार नहीं था। जब मैं हॉस्पिटल पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि दोनो औरतें कोई और नहीं बल्की धर्मपाल जी उर उनके भाई की पत्नियां हैं और उनको उनके पति ने ही पिटा है। FIR दर्ज किया और धर्मपाल जी को थाने बुलवाया। मुझे यकीन नहीं हो रहा था धर्मपाल जी जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति अपनी पत्नी को इतनी बुरी तरह कैसे पीट सकता है! जरूर कुछ गंभीर कारण रहा होगा। उसको समझना और मामला के तह तक पहुंचना आवश्यक था। परिचित होने के चलते उनसे हमदर्दी भी थी और पुलिसवाला होने के चलते अपराध का संज्ञान लेना भी जरूरी था। मैंने उनसे जब पूछताछ किया और जो बात निकालकर सामने आई वह और भी चौंकाने वाली थी।

दोनो भाई को एकलौता ही बेटा था और दोनो बेटो की उम्र चौदह साल और सोलह साल थी। पिछले एक डेढ़ साल से उन दोनों की तबियत खराब थी। उनलोगों ने बहुत सारे डॉक्टर से दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उनकी सेहत लगातार बिगडती जा रही थी। मेडिकल रिपोर्ट में कोई रोग नहीं निकलता था और सेहत गिरती जा रही थी। फिर किसी ने उनको सलाह दिया कि आप एक बार मतंग बाबा से मिलिए वो बड़े सिद्धिप्राप्त हैं वो कुछ उपाय कर सकते हैं। लेकिन लड़कों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनको वहाँ पचास किलोमीटर दूर जंगल मे उनके आश्रम तक ले जाया जाए। वहाँ जाने के लिए आपको लगभग दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ता और रास्ता जंगल और पहाड़ से होकर गुजरता है।

फिर उन लड़कों का कपड़ा और उनके हाथ का अक्षत लेकर दोनो भाई मतंग बाबा के यहाँ गए। आश्रम में पहुँचते ही उनको देखकर मतंग बाबा ठहाका मारकर हँसने लगे। उन दोनों ने उनके चरण में नमस्कार करके कहा बाबा हमलोग बहुत संकट में हैं और बहुत उम्मीद लेकर आपके पास आए हैं।

मतंग बाबा - मालूम है, तुम लोग कितनी समस्या में हो। जो अक्षत लाए हो उसे इस पत्र में रख दो। उस नाव नुमा काले पात्र में अक्षत डालते ही उनके चेहरे का भाव बदलने लगा। फिर वो पात्र में रखे चावल में उंगली घूमाने लगे जैसे कुछ ढूंढ रहे हों। कुछ देर बाद चावल का दो दाना चुटकी में पकड़कर उठाया और उसे फर्श पर अलग रख दिया। बारबार चावल के दोनों दाने को साथ में रखते और वो अलग हो जाते जैसे चुम्बक के विपरीत ध्रुव हों। इसके बाद उन्होंने उनके ऊपर हथेली रखकर कुछ बुदबुदाया और धर्मपाल बंधु से मुखातिब होकर पूछा "क्या आपलोगों की पत्नियां आपस में सगी चचेरी बहन हैं ?"

इन लोगों के हॉं में सिर हिलाते ही मतंग बाबा एकदम गंभीर हो गए। फिर उन्होंने कहा तुम लोगों की बीबी डायन है और एक दूसरे के बेटे को मारने का प्रयास कर रही हैं। फिर उन्होंने उन दोनों का नाम हुलिया सब बता दिया। बच्चों को कब से और क्या परेशानी है सबकुछ बता दिया। अब दोनों भाई के आश्चर्य का ठिकाना नहीं।

दोनों ने हाथ जोड़कर बाबा से उपाय करने को कहा। बाबा ने कहा मैं तो तुम्हारे बेटों को ठीक कर दूँगा लेकिन जबतक उनकी माँ के सोच में बदलाव नहीं होगा स्थायी सुधार नहीं हो सकता है। 

धर्मपाल जी ने कहा हमारी शादी को बीस साल हो गया लेकिन कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि मेरी पत्नी डायन है।

मतंग बाबा ने जोर का ठहाका मारा और कहा डायन या डाय को कोई सिंग या पंख नहीं होता है। वो भी सामान्य मानवीय की तरह समाज मे रहते हैं। लेकिन गंदी सोंच के चलते कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिससे इंसानियत और रिश्ते पर से भरोसा उठने लगता है। तुम उनको यह भनक मत लगने देना की तुमलोग मेरे से मिलकर आए हो। उन दोनों से छुपाकर मेरा भभूति केवल तीन दिन बच्चों को खिला देना। अपनी पत्नी पर नजर रखना जैसे-जैसे बच्चों की सेहत में सुधार होगा उनकी बेचैनी बढ़ने लगेगी। एक सप्ताह के अंदर दोनो बच्चे एकदम बिस्तर छोड़ देंगे और सामान्य हो जाएंगे। शायद तीन महीने से भी कम वक्त बचा था उनकी जिंदगी समाप्त होने में। उनकी मृत्यु अभी नहीं लिखी थी इसके चलते आपलोग यहाँ तक पहुँच गए।

मतंग बाबा ने जैसा बोला था बिल्कुल वैसा ही हुआ। इसमें शंका की कोई गुंजाइश नहीं थी। अतः गुस्से में उन दोनों भाइयों ने अपनी बीबी को पिटा था।

पूरी बात जानने के बाद मुझे यकीन नहीं हो रहा था। अतः मैंने मतंग बाबा से मिलने का फैसला किया। आधिकारिक तौर पर वह इलाका मेरे क्षेत्र में नहीं पड़ता था। मैंने व्यक्तिगत स्तर पर मतंग बाबा से मिलने का फैसला किया।

उनके पास पहुँचने का रास्ता सही में काफी दुर्गम था। समझ मे नहीं आ रहा था इतने सिद्धपुरुष जंगल में क्यों छुपे पड़े हैं। शहर में तो ढोंगी बंगाली बाबा हजारों , लाखों कमा रहे हैं। धर्मपाल जी ने बताया था वो एक रुपया नहीं लेते हैं। अपनी इच्छा ,शक्ति और भक्ति से जो भी देना है भोलेनाथ के सामने रखी दान पेटी में डाल दीजिए।

धर्मपाल जी के बताए के अनुसार मैं बिना किसी से पूछे मतंग बाबा के आश्रम में पहुंच गया। ठंढ़ी का मौसम था। मैंने स्वेटर, टोपी कोट और चादर से अपने को ढक रखा था। मैं लगभग बारह बजे के आसपास आश्रम में पहुँचा। मैंने देखा कि कुटिया के बाहर एक बड़े शिलाखंड पर पालथी मार कर एक वृद्ध लेकिन तंदरुस्त व्यक्ति बैठा है। लंबी सफेद दाढ़ी, कंधे तक फैले घने बाल ,ध्यान मुद्रा में बंद आँखे और वस्त्रहीन शरीर। जनवरी महीने के शीतलहर में भी केवल लंगोटी पहने खुले में बैठे हैं। उनकी यह अवस्था ही मुझे प्रभावित करने के लिए काफी थी। धर्मपाल जी द्वारा दिए गए विवरण के हिसाब से यही मतंग बाबा होंगे। इतने गर्म कपड़े में ढके होने के वावजूद मुझे शीतलहर का भान हो रहा था और वो नंगे बदन अविचलित बैठे थे। उस समय उनके पास कोई नहीं था। अतः सीधा उनके पास पहुँचकर सादार प्रणाम किया।

उन्होंने बिना आँख खोले ही बोला , "यहाँ क्या जानने आए हो दरोगा बाबू।"

मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। फिर भी विनम्रता से उनसे कहा आपका दर्शन करने आया था।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा अकारण नहीं तो कोई मिलता है और नहीं कोई मिलना चाहता

 है।

उनकी आँखें अभी भी बंद थीं। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछ दिया " बाबा इतनी ठंड में भी आप नंगे बदन कैसे रह सकते हैं !!"

उन्होंने आँख खोला और मुस्कुराकर बोले - इतनी दूर से तुम केवल यही जानने तो नहीं आए हो। फिर भी तुमने प्रश्न किया है तो मैं तुम्हे जरूर बताउँगा। 

देखो , अनुभूति हमेशा सापेक्षिक होती है और उसकी तीव्रता परसेप्शन से प्रभावित होती है। पानी शब्द सुनते ही प्यास तीव्र हो जाती है और भोजन देखते ही खाने की चाह बढ़ जाती है। पहाड़ पर रहने वाले को रेगिस्तान की गर्मी को झेलना मुश्किल होता है और रेगिस्तानी के लिए पहाड़ की बारिश नागवार गुजरती है। हम प्रकृति से जितने दूर होते गए हमारी अनुभूतियां और जरूरतें बदलती गईं। जब वस्त्र का अविष्कार नहीं हुआ था तब भी इंसान था और सभी जानवर भी थे। जानवर आज भी बिना वस्त्र के रह लेते हैं ,चारो मौसम में , लेकिन मनुष्य को हर मौसम में अलग वस्त्र चाहिए क्योंकि वह प्रकृति से दूर हो चुका है। जब आप प्रकृति के साथ रहना सिख लोगे तो अनुकूलन एक स्वभाविक प्रक्रिया बन जाती है। प्रकृति में कोई भी बदलाव क्रमिक होता है। यहाँ अचानक कुछ भी नहीं होता है। जो बदलाव आपकी अपेक्षा के अनुसार नहीं होता है वह आपको परेशान करता है, आपको अचम्भित करता है , आपको चमत्कार लगता है। मैंने प्रकृति से अनुकूलन का सम्बंध स्थापित कर लिया है। अतः यह मौसम का बदलाव मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डालता है।


मन ही मन मैं उनकी बात से प्रभावित हुआ और उनके बारे में ज्यादा जानने की जिज्ञासा हुई। मैंने उनसे आग्रह किया कि बाबा अपने बारे कुछ और बताइए और यह बताइए कि आपके पास यह अलौकिक क्षमता कैसे आयी?

मतंग बाबा - यह प्रश्न एक पुलिसवाले का है या एक जिज्ञासु का ?

मैंने कहा यह प्रश्न तो पुलिसवाले का ही था लेकिन उसमें एक श्रद्धावान की उत्कंठा और जिज्ञासा भी शामिल हो चुकी है।


मतंग बाबा - तुम्हारी ईमानदार स्वीकारोक्ति मुझे अच्छी लगी। मैं तुमको वो सबकुछ बताऊँगा जो तुम जानना चाहोगे।

मैं जंगलवासी बनने से पहले IIT कानपुर में फिजिक्स का प्रोफेसर था। मेरा भी भरा पूरा परिवार था। मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ हुआ कि मैं सबकुछ छोड़कर भटकते हुए यहाँ पहुँच गया फिर यहीं का होकर रह गया।


रवि - बाबा, आप विज्ञान के प्रोफ़ेसर होते हुए भी ,भूत-प्रेत , डायन -ओझा आदि में यकीन करते हैं !

मतंग बाबा ने जोर का ठहाका लगाया फिर कहा - देखो , तुम्हारे प्रश्न का आधार धर्मपाल का केस है यदि मेरा अनुमान सही है !!

मैंने हाँ में सिर हिलाया।

मतंग बाबा - दुनिया में दो लोग सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं -ज्ञानी और मूर्ख।ज्ञानी यह जानकर परेशान रहता है कि ज्ञान भंडार इतना विशाल है और उसको अभी कितना कम ज्ञात है। मूर्ख इसलिए परेशान रहता है कि जो मुझे नहीं मालूम वह हो ही नहीं सकता, लोग झूठ बोल रहे हैं, यह सब पाखंड है।

इसलिए जब किसी ऐसी बात से सामना हो जिसे समझ अस्वीकार कर रहा है तो उसे दिल से यह कहकर स्वीकार कर लो सम्भवतः यह मेरी ज्ञान सीमा के बाहर की बात है। क्योंकि किसी भी क्यों का सिलसिला एक बिंदु पर आकर निरुत्तर हो जाता है। वहीं पर विज्ञान की यात्रा समाप्त होती है और अध्यात्म की यात्रा शुरू होती है। यानी अध्यात्म परमविज्ञान है जिसका प्रायोगिक सत्यापन तो नहीं हो सकता लेकिन प्रमाण और परिणाम हर जगह मिलेगा।

मैंने उनसे पूछा कि आप मुझे यह बताइए कि भूत और डायन का अस्तित्व होता हैं क्या ? बहुत सारे लोग कहते हैं कि यह सब अन्धविश्वाश है। तांत्रिक केवल ढोंगी होते हैं।

तभी एक लंगूर वहाँ पर आया और उसके हाथ में एक सुंदर अमरूद था। वह उनके गोद में बैठकर कुछ इशारा किया। फिर उन्होंने कहा "सही बात है , ले जाकर मेहमान को दे दो।"

वह लंगूर उनकी गोद से उतरकर अमरूद लेकर मुझे दे दिया। बाबा ने इशारा किया कि ले लो खास तुम्हारे लिए लेकर आया है। फिर वह जाकर बाबा का पैर दबाने लगा। उन्होंने उसका पीठ थपथपाया और जाने को कहा ।वह आज्ञाकारी की तरह वहाँ से निकल गया। बाबा ने बाद में बताया कि वह कोई पालतू नहीं है।

मंगत बाबा - दरोगा बाबू , इस भूलोक का नियम है कि यहाँ जो भी दिखता है वह यहीं के उपस्थित तत्वों से निर्मित है और इसी में विलीन हो जाता है। यह सजीव निर्जीव सब पर समरूप लागू है।

यह अमरूद जो अभी तुम्हारे हाथ में है वह थोड़ी देर में तुम्हारे पेट में चला जाएगा। उसका कुछ तत्व तुम्हारे शरीर में रहेगा बाकी अलग अलग रूप में निष्पादित हो जाएगा। लेकिन अमरूद जिन तत्वों से बना है वह कहाँ था ? किस रूप में था ? वह अमरूद कैसे और क्यों बना ?

ऐसे बहुत सारे प्रश्न विज्ञान कर सकता है। कुछ का उत्तर भी ढूंढ सकता है। लेकिन इसके आदि और अंत को समझना असम्भव है और जिसको इस असम्भव का ज्ञान हो जाता है वह आध्यात्मिकता के पथ पर मुड़ जाता है। वह कितनी दूर चलता है , कब भटक जाए, कब अटक जाए , कब लौकिक सीमा को पार कर जाए यह व्यक्तिगत साधना और उसके प्रारब्ध पर निर्भर करता है।

जहाँ तक भूत-प्रेत की बात है इनका अस्तित्व होता है। इसके अस्तित्व को अस्वीकार करने वाले भरम की दुनिया में विचरण करने वाले अज्ञानी लोग हैं।

भूत यानी घोस्ट दुनिया का सबसे विवादित विषय है। इसके अस्तित्व को स्वीकार करनेवालों और इनकार करनेवालों में विद्वान और अनपढ़ दोनो शामिल हैं। कैंब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में तो 'घोस्ट क्लब ' बना हुआ है। कई यूनिवर्सिटी में इस पर साइंटिफिक स्टडी हो रही है। ऐसा इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि विंस्टन चर्चिल ने अमेरिका के व्हाइट हाउस में अब्राहम लिंकन का भूत देखा था और उसे "गुड इवनिंग मिस्टर प्रेसिडेंट" कहा था।

अमेरिका में एक पॉपुलर "घोस्ट हंटर" टीवी सीरियल आया था जो 230 एपिसोड चला था। वहाँ सब पढें लिखे हैं लेकिन वहाँ 33% लोग घोस्ट में विश्वास करते हैं। Michel Waskul ने अपनी पुस्तक "Ghostly Encounter of The Haunting Everyday Life" में लिखा है घोस्ट की कोई भी आसान व्याख्या नहीं हो सकती है। यह या तो राह भटकी आत्मा होती है या टेलिपैथिक इन्टीटी जिसे हमारे दिमाग मे प्रोजेक्ट कर दिया गया हो।

Anthropomorphism के प्रवर्तक आदम वेटज़ ने कहा है हम भूत में इसलिए विश्वास करते हैं क्योंकि हम यह विश्वास नहीं करना चाहते कि यूनिवर्स में कुछ भी आकस्मिक या विन्यास रहित हो सकता है। लेकिन भूत के सम्बंध में आइंस्टीन

का सुझाया First Law of Thermodynamic ही सर्वोत्तम लगता है। उसके अनुसार ऊर्जा का ना तो निर्माण हो सकता है और ना ही विनाश हो सकता है। केवल उसका रूपांतर होता है। यदि यह सत्य है तो मरने के बाद शरीर मे उपस्थित उर्जा कहाँ चली जाती है ?

इस बिंदु पर विज्ञान की समझ खत्म हो जाती है और अध्यात्म अपने स्वभाव के अनुसार प्रमाण नहीं देता क्योंकि वह मानता है कि अनुभूति हमेशा व्यक्तिगत होती है और आस्था से संचालित होती है। यही वो ग्रे जोन है जहाँ भूत को मनाने वाले और इनकार करने वाले अपना दावा अपने ढंग से पेश करते हैं।

मूल तत्व ऊर्जा है जो साकार और निराकार रूप में अपने को परिवर्तित करते रहता है।इसको देखने और समझने के लिए हमारे पास दो साधन हैं - तन की आँख और मन की आँख। तन की आँख की भौतिक सीमा है लेकिन मन की आँख की क्षमता अंतहीन है। आजकल जैसे सभी डाटा क्लाउड में सेव होता है और जिसके पास कोड है वह उसको जब चाहे एक्सेस कर सकता है। उसी तरह इस ब्रह्मांड की प्रत्येक गतिविधि का रिकॉर्ड अलौकिक क्लाउड में स्टोर होता है। जो अपनी मन की आँख को साधना जान जाता है वह उस डाटा को एक्सेस कर पाता है उसमें एडिट/ डिलीट भी करने की क्षमता प्राप्त कर सकता है। हमारा मानस एक सेल्फ ईवोल्विंग सॉफ्टवेयर की तरह है जो कुछ भी कर सकता है। अतः सामान्य मानवीय को जो चमत्कार या असम्भव लगता है वह भी उसके लिए संभाव्य के दायरे में आता है। इसके दक्ष साधक के लिए अतीत , वर्तमान और भविष्य देख पाना एक निचले पायदान की उपलब्धि है।

तुम्हारे यहाँ पहुँचते ही मैंने वह सब देख लिया कि तुमने मुझसे मिलने का निर्णय कब और क्यों किया, यहाँ तक कैसे पहुँचे। जिसको जितनी सिद्धि प्राप्त होती जाती है वो और उसमें आगे बढ़ना चाहता है। सच्चा साधक कभी भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन नहीं करता। कोई जरूरतमंद को मदद भले ही कर देता है। तुम्हारे धर्मपाल जी का केस वैसा ही था।

हाँ कुछ गलत मानसिकता के लोग इस साधना का दुरुपयोग करके भटकती आत्मा को अपने स्वार्थ पूर्ति में प्रयोग करते हैं। यह गलत है और उनका निषेध होना चाहिए। एक कहावत है ना कि "हैबिट डाई हार्ड" , जो गलत लोग होते हैं वो सशरीर हो, अशरीर हो या सिद्धि प्राप्त हो अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। अतः उनसे सावधान रहना चाहिए।

 मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ। उनसे आग्रह किया कि बाबा मेरे बारे में कुछ बताइए। उन्होंने कहा तुम अपनी जिंदगी को एन्जॉय करो। मन में भरकर नहीं मन भरकर जीवों क्योंकि सात साल बाद तुम्हारी अकाल मृत्यु होने वाली है। उनकी कही बात सत्य हुई मैं गोली लगने से मरा और आज तुम्हारे साथ बात कर रहा हूँ।


क्रमशः -----



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