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Sukhwinder Singh Rai

Romance

4  

Sukhwinder Singh Rai

Romance

​अजनबी सा हमसफ़र

​अजनबी सा हमसफ़र

3 mins
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चंडीगढ़ के एक बहुत बड़े और महंगे कैफ़े में हल्की-हल्की म्यूज़िक बज रही थी। **करण** काउंटर के पास खड़ा था, उसके बाल सलीके से सेट थे और आँखों में एक शांत सा एटीट्यूड था। वह अपने किसी दोस्त का इंतज़ार कर रहा था। तभी कैफ़े का काँच का दरवाज़ा खुला और दो लड़कियाँ अंदर आईं। आगे चल रही लड़की थी **मन्नत**। उसने डिज़ाइनर सूट पहना हुआ था, चेहरे पर महंगा चश्मा था और चाल में एक अजीब सा गरूर था। उसके ठीक पीछे उसकी सबसे पक्की सहेली **प्रीत** चल रही थी, जो बार-बार अपने फोन में कुछ देख रही थी। जैसे ही मन्नत काउंटर की तरफ बढ़ी, उसकी नज़र सीधे करण पर पड़ी। एक पल के लिए मन्नत के पैर वहीं थम गए। उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं और हाथ में पकड़ा हुआ उसका महंगा क्लच बैग थोड़ा सा काँप गया। लेकिन अगले ही पल, उसने खुद को संभाला, चेहरे पर एक बनावटी सख्ती लाई और करण के ठीक बगल से गुज़रने लगी, जैसे उसने उसे देखा ही ना हो। करण के होठों पर एक तीखी और दर्दभरी मुस्कान आ गई। वह अपनी जगह से हिला तक नहीं, बस अपनी गहरी आवाज़ में बोला, "शहर बदलने से अगर पुरानी यादें भी बदल जातीं मन्नत, तो आज इस कैफ़े के दरवाज़े पर आकर तुम्हारे पैर यूँ अचानक ना रुकते।" मन्नत रुक गई। उसने पीछे मुड़कर बड़े ही सीरियस और अजनबी लहज़े में कहा, "Excuse me? आप कौन हो? मैं आपको नहीं पहचानती।" मन्नत की बात सुनकर उसके पीछे खड़ी प्रीत का मुँह खुला का खुला रह गया। प्रीत को अच्छी तरह याद था कि कॉलेज के दिनों में मन्नत की पूरी दुनिया इसी करण के इर्द-गिर्द घूमती थी। दोनों ने साथ में कितनी रातें जागकर बातें की थीं, कितने वादे किए थे। करण ने मन्नत की तरफ एक कदम बढ़ाया। उसने कोई गुस्सा नहीं दिखाया, कोई तमाशा नहीं किया। वह मन्नत की आँखों में देखते हुए बड़े ही ठंडे और कातिलाना अंदाज़ में बोला: "मुझे क्यों नहीं पहचानती मन्नत? चल कोई बात नहीं... अगर तुम मुझे नहीं पहचानती, तो पूछ ज़रा अपने नाल दी से... पूछ प्रीत से, कि मैं कौन हूँ। तुम्हारी ये सहेली ही तुम्हें बताएगी कि कॉलेज के उन दिनों में जब तुम रातों को छुप-छुप कर रोती थीं, तो वो कौन था जिसके लिए तुम्हारी आँखें तरसती थीं।" प्रीत ने तुरंत मन्नत का हाथ पकड़ा और दबी आवाज़ में कहा, "मन्नत! ये क्या पागलपन है? ये करण है... तुम इसे कैसे भूल सकती हो? तुम तो मुझे अपनी और इसकी हर बात बताती थीं!" मन्नत की चोरी पकड़ी जा चुकी थी। समाज के डर से या अपनी नई अमीर जिंदगी के दिखावे के चक्कर में वह अनजान बनने की कोशिश तो कर रही थी, पर मन्नत अंदर ही अंदर रो रही थी। उसका झूठा गरूर पूरी तरह बिखर चुका था। करण ने एक आख़िरी बार मन्नत को देखा और कहा, "यादें छुपाने से मिटती नहीं हैं मन्नत। ज़रा अपनी इस सहेली से अकेले में पूछ लेना, यह मेरी अधूरी कहानी आज भी तुम्हें ज़ुबानी सुना देगी।" करण इतना कहकर कैफ़े के दरवाज़े से बाहर निकल गया, और मन्नत वहीं प्रीत का हाथ पकड़े भीगी आँखों से उसे जाते हुए देखती रह गई। ### **सुखविंदर की कलम से...**✍️ > "दोस्तों, जिंदगी में चाहे कितना भी बड़ा मुकाम हासिल कर लो या वक्त कितना भी बदल जाए, लेकिन कभी अपने उस बीते हुए कल और उस इंसान से मुंह मत मोड़ना जिसने आपके बुरे वक्त में आपका हाथ थामा था। दिखावे की इस दुनिया में झूठी शान के लिए अपनी सच्ची मोहब्बत और पुराने रिश्तों को अनजान मत बनाओ, क्योंकि चेहरे का नकाब तो एक दिन उतर ही जाता है, पर जो दिल टूट जाता है वह फिर कभी नहीं जुड़ता।" >  


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