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Abhishu sharma

Inspirational

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Abhishu sharma

Inspirational

आत्मसम्मान का बीज

आत्मसम्मान का बीज

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"यह मेरा है ,यह तेरा नहीं है !, चल निकल यहां से ,तेरे बाप दादा ने भी कभी अपने सपने में देखा है यह सब , तेरे जैसे का इतनी अच्छी आलिशान जगह से क्या वास्ता", इस प्रकार के कथन आम थे राजू के लिए ,जब कभी काम की तलाश में भूले भटके कभी किसी अमीरजादे की "निजी " ज़मीन जायदाद पर उसके कदम पड़ जाते थे, उसे ऐसे कर्कश बाणो का सामना यदाकदा हो ही जाता था । इस दुनिया के लिए भले ही उसके तबके लोगों का कोई आत्म सम्मान नहीं होता पर है तो वह भी इंसान ही ना। कभी कभी तो वह सोचता था की क्यों परवरदिगार ने उसके अंदर आत्मसम्मान जैसी कष्टदेयी भावना का बीज डाला। वह सोचता की गरीबी का अभिशाप क्या कम था की ज़िंदा रहने की अभिलाषा में हर पल चकनाचूर होते मेरे आत्मसम्मान की नींव पर बने इस कांच के महल के रोज धराशायी होकर ज़मीन पर बिछने और फिर उन्ही कांच के टुकड़ों पर , जीवन यापन करने की कठिन डगर पर चलने की ज़िद्द में अपने ही तलवों को तेज़ाब सा छलनी करवाने की पीड़ा को भी उसी की हाथों की लकीरों में रेंत दिया तूने भगवान् ।   कितना अच्छा होता की वह यह तिरस्कार ,अपमान की कड़वाहट ,यह पूरे बदन को चीरता ये गरल सा कुछ महसूस ही नहीं कर पाता ।अपने अंदर रचे बसे जहर को मारने ,उसने नशा करना,मदिरा निगलना शुरू कर दिया था ,जो तेजी से उसके तन के साथ -साथ उसकी चेतना ,उसकी अच्छाई ,उसकी होनहारता ,उसकी ऊंचाई को दीमक की तरह अंदर से खोखला करने लगा।  

बेचारा राजू ! इस अनंत दुनिता में अपना कहने को उसके पास दो गज ज़मीन तक नहीं थी। एक किराये का घर था जहाँ वह रात को सोने जाता था। नींद में भी सुकून का नामोनिशांन तक नहीं था की कब मकान मालिक उसे नोटिस थमा दे की अगले कुछ दिनों में उसे यह कमरा खाली करना पड़ेगा ।जहाँ वह काम करता है वह एक निजी संस्था है , जहाँ कटुता और संवेदनहीनता के अध्याय का एक नया पाठ लिखा जा रहा था उसके लिए । इसी निष्ठुरता और कठोरता में नहायी हुई निर्ममता का जीता जागता उदाहरण था राजू का मालिक।

ऐसे ही एक दिन अपने मालिक की कटुता की पराकाष्ठा में घुली चाशनी से ओतप्रोत डांट सुनकर उससे रहा नहीं गया और उसके आँखों से अश्रुधारा बह निकली और जैसा की इस समाज की रीत है की "मर्द रोते नहीं है", तो इस वर्जित जज़्बात को लोगों के सामने उजागर होने से रोकने हेतु वह दफ्तर से बाहर निकल आया और आँखों मैं पानी,चेहरे पर तनाव का सूरज सा तेज लिए लिए वह बस चलता रहा , कोनसी दिशा ,किस मोड़ ,कितनी गति से वह चला जा रहा था ,इनमे से किसी भी बात का इल्म तक नहीं था , अभी बस उसके पैर उसे ले जा रहे थे, शायद वह बस अपने दफ्तर जितना दूर हो सके जाना चाहता था , अचानक उसे एक गिरजा घर दिखा और वह बिना कुछ भी धर्म -अधर्म का सोचे समझे बस उसके अंदर दाखिल हो गया।

वहां पादरी ने अभी प्रभु की प्रार्थना पूर्ण ही की थी, मोमबत्तियों की रौशनी और उन प्रकाश से नहाये पावन कक्ष की जगमगाहट ,लौ की गर्माहट,श्रद्धालुओं की सच्चे मन से की गयी अपने ईश्वर से पुकार, इन सब के समावेश से उत्पन्न हुए सकारात्मक वातावरण की और वह बरबस खिंचा चला गया। आँखों में नमी , चेहरे पर निराशा से उभरी हताशा का भाव राजू के चेहरे पर देखकर पादरी ने बेहद प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और उसके माथे पर स्नेह भरा चुंबन कर उसे अपने सीने से लगा लिया ,

कभी भी इतने अधिक तनाव, तिरस्कार से परिपूर्ण इंसान को जब आशा के प्रतिरूप, आशा के उलट , प्रेम से सराबोर ममता का सागर दिखता है, तो रेगिस्तान में नखलिस्तान या उद्यान दिख जाना ,या किसी डूबते को सहारा मिल जाने से भी अधिक आनंद की अनुभूति होती ह। वह,उसकी गहराई की माप का अनुमान लगाए बिना एक पल की भी देर किये उस समुन्दर में डूब जाने को ,अपनी तैर पाने की हद को सोचे बिना , संक्षिप्त में कहें तो ,दिमाग का एक कतरा भी खर्च किये बगैर बस दिलोसुकून वास्ते उस समुन्दर में डुबकी लगाने उतर जाता ह। पादरी के गले लगाते ही वह फुट फुट कर एक मासूम बालक की भांति रोने लगा , इस पांच मिनट की मुलाक़ात में उसने ,उनके गले लग कर रो ,अपनी सारी ह्रदय की पीड़ा , वेदना सारा दर्द उनके समक्ष बिना किसी लागलपेट के,उनसे लिपट के परोस दिया था । उसकी पकड़ इतनी अधिक मजबूत थी की पादरी को भी उसकी मजबूत पकड़ से उसके दुःख की गहनता का अंदाजा लग गया। उन्हें समझ आ गया की जिस तरह हर कोई इस दुनिया में अपने अपने हिस्से का पारस पत्थर तलाश रहा है , अपने लोहे से बने ह्रदय में कनक सा सुकून की कुछ बूंदे घोलने को तड़प रहा है , राजू भी उसी हीनता से ग्रस्त अपना हारक खोज रहा है। उन्हें आज उसकी मदद करनी ही होगी , अन्यथा वह भी अवसाद के दलदल में धंसता चला जायेगा और कब यह दलदल उसे अजगर की भांति निगल जायेगा और उसके पूरा जीवन का रस निचोड़ लेगा उसे पता भी नहीं चलेगा।

राजू बस लगातर रोये जा रहा था, पादरी ने भी उसे रोका नहीं की बह जाने दिए उसके दुःख के पट जो बहुत आरसे बाद आज खुल गए थे और उसका प्रवाह इतना तीव्र था की बड़ी से बड़ी चट्टान तक उसे रोकने में विफल हो रही थी इसलिए पादरी ने भी उसे रोका नही। काफी देर रोने के बाद उसे अपनी स्तिथी ज्ञात हुई , मजबूत पकड़ का ख्याल आया और पकड़ ढीली होने का आभास पाकर पादरी ने उसे वहां लगी मेज पर बैठा दिया और उसे एक मोमबत्ती जलाने को देकर , उसे कुछ देर खुद के साथ ,अपने प्रभु के साथ वक़्त बिताने, स्वयं का प्रभुत्व पहचानने के लिए ,उसे मन से प्रार्थना करने को कह कर वे वहां से चले गए।

राजू ने उन्हें जाते देखा और मुस्काते हुए टोका की उसे पादरी जी के धर्म की , इस गिरिजाघर की अर्चना ,पूजा करनी नहीं आती है ,कहीं उससे जाने अनजाने में उनके धर्म का निरादर न हो जाए। पादरी ने मुस्कुराते हुए उससे कहा की तुम बस सच्चे दिल से प्रार्थना करो , जैसे अपने किसी मित्र के समक्ष बिना किसी नकाब के बातें करते हो, ठीक उसी प्रकार अपने प्रभु से बात करो। अपनी मन के चक्षुओं से उनसे वार्तालाप कर। पादरी उसे समझाते हुए बोले की , बेटा ! तुम्हारा मन साफ़ है,पानी सा निर्मल हैं , प्रभु को बस यही चाहिए और कुछ "भी" नहीं ,और वही तो प्रार्थना कहलाती है , ऐसा कहकर वे चले गए।


राजू ने अपनी आँखें बंद की , ईश्वर के समक्ष अपना शीश झुकाया और अपनी प्रार्थना आरम्भ की। "लोग कहते हैं तुम्हे तो सब कुछ पता है , तुम सब जानते हो , अन्तर्यामी हो , चमत्कार करना जानते हो पर क्या मेरी बारी में क्यों तुम बस बुत बने तमाशा देख रहे हो। तुम तो अपने सारे बच्चों का एकसमान ख्याल रखते हो न फिर क्यों मुझ को ही भूल गए हो तुम ? क्या मैं तुम्हारी आदर्श संतान नहीं हूँ क्या , बोलो न इस जगत के कर्ता-धर्ता ? और अगर मैं नहीं भी उतरता खरे तुम्हारी आदर्शता के पैमाने पर तो भी क्या एक पिता का यह कर्त्तव्य नहीं की अपने कमजोर बच्चों पर अधिक ध्यान दे , उन्हें ज्यादा महत्व दे , हूँ तो तुम्हारी ही रचना ना मैं मेरे परवरदिगार !, फिर क्यों मुझे बस ऐसे ही छोड़ दिया तुमने इस पृथ्वी के निर्मम लोगों के बीच।

ऐसे ही करीब डेढ़ घंटे अपना दुखड़ा रोने के बाद कब बेंच पर ही उसकी आँख लग गयी, उसे पता ही नहीं चला , दोपहर की प्रार्थना करने जब पादरी आये तो उसे वहां एक बालक सी भोलेपन की मुस्कान चेहरे पर लिए सोते देख खुद भी मुस्कुराये बिना रही रह सके और साथ ही में खड़े अपने पहरेदार को कुछ खाने का लेने को कह, शाम की प्रार्थना की तयारियों में व्यस्त हो गए, पहरेदार कुछ ही देर मैं खाना ले आया, पादरी ने बेहद प्यार से राजू के सर पर हाथ फेरा , उनके हाथ का स्पर्श पाते ही राजू उठ खड़ा हुआ और आँखें मलते हुए घडी पर नज़र दौड़ाई , उसे लगा उसे दफ्तर से निकले काफी वक़्त हो गया है तो भागने को, दफ्तर वापस जाने को एक दम से उठ खड़ा हुआ तभी उसने महसूस किया की उसके जूते वहीँ पास में रखे हुए हैं तो पादरी ने बताया की उन्होंने उसके जूते उतार दिए थे जब वह सो रहा था ताकि वह ठीक से आराम कर सके । ऐसा कहकर उन्होंने उसे हाथ पकड़ कर वापस मेज पर बैठाते हुए ,उसके हाथ में खाने की प्लेट थमा दी , भूख तो राजू को बहुत तेज़ लगी थी और वह खाना भी चाहता था पर दफ्तर पहुँचने की जल्दी और मालिक का तमतमाया चेहरा याद कर वह खाने से सजी थाली को मेज पर रख जूते पहनने लगा , पादरी ने बहुत आत्मीयता से उसके मन की बात समझते को हुए उसके सर पर हाथ फेरा और कहा की "डरो नहीं , तुम्हारा मालिक तुम्हे कुछ नहीं कहेगा और तुम्हारी नौकरी को भी कोई आंच नहीं आएगी , तुम इत्मीनान से खाना खा लो, यह सब पादरी ने इतनी अपनेपन से कहा की वह मना नहीं कर सका और खाना खाने मेज़ पर बैठ गया।

राजू ने आज से पहले कभी इतना सरल और स्वादिष्ट खाना नहीं खाया था , पेट तो उसका रोज ही भर जाता था पर आदर और प्रेम की मन की तृप्ति , मन को संतुष्टि उसे आज ही मिली थी , इतना स्वादिष्ट खाना खाकर वह टहलने बाहर आया तो गिरजाघर से ही लगा एक खेल का मैदान पर उसकी नज़र गयी जहां छोटे बच्चे पुराने वह सभी खेल खेल रहे थे जो वह बचपन में खेला करता था। बालक्रीड़ा की याद , उन बच्चों की नटखटता देखकर वह मुस्कुरया और उन्हें निहारने लगा और अपने अतीत , अपने बचपन के स्वर्णिम दिनों की यादों में खोने लगा की कैसे माता -पिता के प्रेम की छाँव में ज़िन्दगी कितनी सरल और सुगम थी। सुबह सवेरे नहा धोकर, माँ के हाथ का पकाया खाने का डब्बा ले स्कूल जाना , वापस आकर अपनी मित्र मण्डली के साथ खूब धमा-चौकड़ी मचाना। सूरज ढलते माँ का मनुहार कर वापस उसे घर लाना। फिर मुँह फुलाकर बैठे अपने लाडले को फूली-फूली रोटियां ,घी के अभाव में, अपनी उम्मीद की चिकनाहट से बातों से रोटी चिपुड़ कर माँ का अपने हाथों से एक एक निवाला खिलाना कितना सुख देता था उसे।तब प्रेम रुपी सोने की खान की विध्यमानता में घी आदि विलास की हीनता का कभी उसे आभास तक नहीं हुआ था। तभी ,पीछे से आते पादरी ने उसे भूतकाल में अर्श पर सजे सिंहासन पर से वर्तमान के फर्श पर वापस ला दिया। उन्होंने राजू के कंधे पर हाथ रखा और उसकी आँखों में उतरी हर्षोल्लास को भांपते हुए बोले आज आरसे बाद तुम्हारे अंदर का बच्चा जागा है जिसे तुमने इस खोखले समाज के कमजोर और निर्बल पहरेदारों के डर से झूठ की थपकियाँ देकर सुला दिया था। इतना कहकर वे चुप हो गए और उसके सर पर स्नेह भरा हाथ फेरते हुए मुस्कुराते हुए बोले की "जाओ और मजे लूटलो इस ज़िन्दगी के अनमोल रसों का " , खो जाओ इस मासूम उन्माद में , वह तो जैसे किसी अन्य के मुख से इसी बात का इंतज़ार ही कर रहा था और पादरी जी के मुख से अनकही सहमति के लफ्ज़ सुनते ही ,त्यों ही वह आमोद -प्रमोद के महासागर में भीग , पलक झपकते ही भागकर मैदान के पास आगया ,


उसे मैदान में पहुँचने की, बच्चों के साथ एक बार फिर से बच्चा बनने की, अपना बचपन फिर से जीने की इतनी अधिक जल्दी थी की पार्क का गेट जो दूसरी तरफ था, वहां तक जाने का भी उसने धैर्य नहीं था और वह दस फुट की दीवार पल भर में छलाँगकर मैदान में जा पहुंचा, उसकी इस हरकत को अपने खुलते मुँह और आश्चर्य से फैलती आँखों से सभी बच्चे उसकी शोख चपलता और चंचलता का गवाह बने , पार्क में प्रविष्ट होते ही सब बच्चों ने तालियां बजायी और उसे हाथ पकड़ के उसका अपने साथ खेलने ले आये , और अपनी टीमों में उसे लेने के लिए झगड़ने लगे , उन बच्चों के साथ वापस अपना बचपन जीते हुए कब शाम गयी उसे पता ही नहीं चला , उसने कभी घर से दफ्तर आते हुए ये गोइरिजाघर देखा था। आज वह खुश था , उसकी अपनी इतनी अधिक ज़मीन जायदाद होते हुए भी , सभी तरह की सुविधाएँ होते हुए भी उसे आज जो ख़ुशी जो उल्लास की प्राप्ति हुई थी की उसका कोई इस पूरे ब्रह्माण में कोई दूसरा सानी नहीं थ। आज उसे अपनी आज़ादी, अपने सुकून की उड़ान भरता पक्षी-वृन्द जो मिल गया था। वह वापस दफ्तर पहुंचा तो पाया की सब कुछ सह , सामन्य है , अब उसके भीतर भीनी सी भी भीति का नामोनिशान तक नहीं था। उसे ज्ञात हो गया था की उसका डर ही उसकी खुशियों ,उसकी आने वाली कामयाबियों के बीच का पत्थर बना हुआ था , जिस पत्थर को वह अपना सबसे बड़ा शत्रु समझ रहा था सही मायने में वह उसकी थमी हुई , बहकी हुई ज़िन्दगी का मील का पत्थर साबित हुआ था। माता पिता के चले जाने के बाद शिक्षा का अभाव , यह हीं भावना उसके अवचेतन में घर करने लगी और कब उसने इतना विशालकाय रूप धारण कर लिया की हमेशा खुश रहने वाला , सकारात्मकता हर चीज़ में ढूंढने वाला राजू इस दुनिया से नफरत करने लगा उसे खुद पता नहीं चला था ।

पर आज सारे नकाब , सारे आवरण ,दूसरों से अधिक बड़ा होने के सारे मोह वह आज पीछे छोड़ आया था।


"एक जो दीवार सी खड़ी थी मेरे और मेरी आज़ादी के बीच ,आज उस कश्मकश की पराकाष्ठा में अपने ही आत्मसंदेह को हराते हुए ढहा दिया मैंने उसे आज"। अपनी शिक्षा पूरी करने का निर्णय लिया था उसने आज।

आज ग्यारह साल बाद इस शहर का सबसे दयालु , सबसे अमीर , सबसे नामचीन व्यापारी राजू अपने सात सौ एकड़ में फैले व्यवसाय के मध्य खड़ा था और विचार कर रहा था की आज वह जब उसके द्वारा बनाये गए सभी जरूरतमंद बच्चों के लिए निःशुल्क विद्यालय के नांगल में विशेष अतिथि "पादरी जी" को लेने गिरजाघर जायेगा तब ईश्वर से अपनी बातचीत में अपने पालनकर्ता से पूछेगा की ,"क्या! उसे, इस जगत के पालक को , किसी से प्यार नहीं ?, क्या !तुम्हे किसी की जरूरत महसूस नहीं होती ?, क्या! तुम्हे अपनी पारस पत्थर सी चिड़िया की चाह नहीं ?

बदले में जवाब मिला की "मैं प्रेम के लिए नहीं बना हूँ" , "मैं प्रेम से बना हूँ"।

राजू अब समझ गया था की क्यूँ ईश्वर आत्मसम्मान का बीज बोता है अपनी हर रचना में , यह तो उस रचनाकार का सबसे अनमोल उपहार है अपनी लिखी हर कविता के लिए , बस उसे समझने का धैर्य चाहिए। आत्मसम्मान के बीज से पनपे वृक्ष पर लदे फलों की मिठास में इस अनमोल जीवन के हर एक रस का स्वाद होता है।



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