आश की ज्योति
आश की ज्योति
रावी व्हीलचेयर पर बैठी विचारों में गुम थी। आज उसने भले ही जिंदगी की तमाम मुश्किलों पर जीत हासिल कर ली थी, किंतु लोगों का रवैया उसे हताहत कर देता था।
वह मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी, अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली रावी पढ़ने-लिखने में होशियार थी । वह डाक्टर बनना चाहती थीं लेकिन वह दिन उसकी जिंदगी का काला दिन बन गया था..घर से कालेज के लिए निकली और एक अनियंत्रित ट्रक ने उसकी स्कूटी को टक्कर मार दी, वह उछल कर जमीन पर गिरी की एक मोटर साइकिल उसकी कमर पर से गुजर गई। इसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा कि क्या हुआ??उसके सपने वहीं पर कुचल गए थे।
दो महीने बाद जब होश आया तो डाक्टर ने स्पष्ट कर दिया कि आगे की जिंदगी उसकी व्हीलचेयर पर ही गुजरेगी। डाक्टर बनने का सपना टूट गया था। हालातों से लड़ते हुए वह निराश हो गई थी, लेकिन पापा ने हार नहीं मानी। उसकी पढ़ाई का इंतजाम कर दिया । उसे प्रेरित किया कि और भी कई क्षेत्र है जिनमें वह अपनी किस्मत आजमा सकती है। पापा पूरे जी -जान से लगे हुए थे कि रावी सदमे से बाहर आ जाए। लेकिन उसकी उदासी टूट ही नहीं रही थी। एक दिन पापा उसे लेकर एक इंस्टीट्यूट में गए। वहां दिव्यांग छात्र बड़े मनोयोग से अपने कैरियर को लेकर कार्य में संलग्न थे। रावी यह सब देखती रही और जब वह घर लौटी तो बहुत कुछ बदल चुका था।
रावी के अंदर जिंदगी को फिर से जीने की लालसा जागी। उसने पढ़ना शुरू किया और साइंस में फर्स्ट ग्रेड टीचर के पद पर नियुक्ति पाई । पोस्टिंगअच्छे स्कूल में हुई। लेकिन लोगों की बेचारगी भरी निगाहें उसे हताहत करती। स्कूल में दिव्यांग के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी , उसे व्हीलचेयर पर आने-जाने में परेशानी होती, लेकिन पापा सपोर्ट के लिए सदा साथ रहे। जब दिव्यांगों के हर जगह उचित व्यवस्था करने की कानूनी कार्रवाई के नोटिस सरकार की तरफ से जारी हुए तो स्कूल में भी रेम्प बन गया। स्कूल प्रशासन ने उसे एक हेल्पर उपलब्ध करा दिया। उसी वर्ष उसे वेस्ट टीचर का अवार्ड भी मिला।
उसके विद्यार्थी, उससे बहुत इंस्पायर थे । वे उससे घर पर भी पढ़ना चाहते थे। रावी सोच में पड़ी हुई थी कि क्या करें वह ?
पापा ने इसका समाधान भी खोज निकाला और रावी ने घर पर भी पढ़ाना शुरू कर दिया। एक दिन उसे एक स्कूल में इंस्प्रेशन के तौर पर इन्वाइट किया गया, उसने देखा कि वहां सारे बच्चे दिव्यांग थे, उसने बच्चों से बात की , सभी लाइफ में कुछ करना चाहते थे। इंडिपेंडेंट बनना चाहते थे। लेकिन स्कूल प्रशासन उनकी प्रतिभा को निखारने के स्थान पर सिर्फ शिक्षित कर रहा था।
रावी ने घर आकर पापा से सारी बातें डिस्कस की। पापा ने कहा-तू खुद का एक एनजीओ खोल ले बेटा!ऐसे बच्चों की प्रेरणा बन। मेरे से जितना बन पड़ेगा, मैं तेरी मदद करूंगा।
उसने एक एनजीओ खोल लिया और ऐसे बच्चों को ढूंढ-ढूंढ कर उसने , उनसे उनकी मंशा , उनके जीवन का उद्देश्य पूछना प्रारंभ कर दिया उसने बच्चों के हुनर को पहचाना।
खेल-कूद, तकनीक, पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्टजैसे कई विषयों में बच्चों ने रूचि जाहिर की। बच्चों की काबिलियत के हिसाब से सुविधाएं जुटाने का कार्य करने में बहुत सारीअड़चनें आई , पर उसने हार नहीं मानी। उसने देखा कि बाहर वाले तो ऐसे बच्चों से उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाते ही थे, घरवालों का व्यवहार भी नकारात्मक ही होता था। बहुत कम पेरेंट्स ऐसे मिले जो ऐसे बच्चों को बड़े लाड़-प्यार से पाल रहे थे। रावी न उन लोगों से एनजीओ में आकर बच्चों की देखभाल का प्रस्ताव रखा और वे सहर्ष मान भी गए। एक अच्छी और सुगठित टीम बन गई थी उसके एनजीओ की। सब ठीक-ठाक चल रहा था।
उसके प्रयासों को पंख तब लगे , जब कुछेक संस्थाओं ने स्वेच्छा से उसका सहयोग करना प्रारंभ किया। शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य जोरों पर था। अपने बच्चों को खुश देख कर पेरेंट्स भी बहुत खुश थे। सभी यथायोग्य सहयोग कर रहे थे। रावी बहुत खुश थी। उसकी मेहनत साकार हो रही थी। दिव्यांग बच्चों को जैसे पंख मिल गए थे। सब अच्छा चल रहा था। इन बच्चों में सामान्य बच्चों से ज्यादा लगन, अपने कार्य को पूरा करने की चाह और दृढ़ निश्चय था। बच्चे बहुत जल्दी सीख रहे थे। ईश्वर ने उन्हें अंगहीन न भले ही बनाया था, पर उनकी क्षमता सामान्य बच्चों से दुगुनी थी। अपने आपको बेचारगी से ऊपर उठाने का जज्बा उन सबमें था। ये एक ऐसी दुनिया थी, जहां छल- फरेब का कोई नाम न था। बस आगे बढ़ने की चाह थी। अपने आपको सिद्ध करने की चाह थी।
किंतु आज सुबह से उसका मूड खराब था। घर में कुछ रिश्तेदार आए हुए थे। उनकी बातों से रावी आहत हो उठी थी। सुबह से एक ही चर्चा घर में हो रही थी कि रावी अकेले जिंदगी कैसे गुजारेगी। आप लोग कब तक बैठे रहोगे ? इत्यादि-इत्यादि।
कभी कोई उसे देख कर 'बेचारी'कहता तो कोई झूठी संवेदना दिखाते हुए आंसू बहाने लगता। ये उसकी वुआ है, रिश्ता लाईं है ताकि रावी का भविष्य सुधर जाए। ये मेरा भविष्य सुधारेंगे ? अब तक तो किसी ने सुध न ली।
अचानक से क्यों...?
रावी इन्हीं बातों से हताहत थी। ये क्या उसका भला सोचेंगे?उसे साफ नजर आ रहा था कि उसकी प्रतिष्ठा और धन-संपत्ति का लालच इन लोगों को यहां खींच लाया है। पर वह क्यों डर रही हैं?ये जंग उसने खुद जीती है, तब तो इनमें से कोई भी यहां नहीं आया!अब कुछ करने का समय है। तो ये सामाजिक परंपराओं का ढोल पीटने आ गए।
तभी उसे पापा का स्वर सुनाई दिया-मैंने अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाया है। वह जीवन में क्या करेगी?कैसे करेगी, कब करेगी , अब ये निर्णय उसका है। मैं उस पर कोई दबाव नहीं डालूंगा।
शाम को रावी ने सबके समक्ष घोषणा कर दी कि कोई भी उसके भविष्य की चिंता न करें। वह इंडिपेंडेंट है और अपना ख्याल रख सकती है। किसी अपाहिज को कोई अपनी जीवनसंगिनी क्यों बनाना चाहता है, इसे मैं बखूबी समझती हूं। और हां मेरे यहां ये जो दिव्यांग बच्चे हैं , बस यही मेरा परिवार है तो कृपया आप लोग मुझे मेरे हाल पर वैसे ही छोड़ दें, जैसे अभी तक छोड़ा हुआ था।
इतना कहकर रावी अपने कमरे में आ गई, सुबह पापा ने बताया कि सब जा चुके हैं। पता नही लोग दूसरों की जिंदगी में बेवजह दखल क्यों देते हैं ?
पापा !आप नाराज़ तो नहीं हो। मैंने कल बहुत बुरा व्यवहार किया उन लोगों से।
नहीं बेटा ! यदि तू न कहती तो मैं कहता। ऐसे लोगों से क्या डरना ?
पापा मैं अब कुछ नया करना चाहती हूं। मैं खेलों में भी अपना करियर बनाना चाहती हूं और भी बहुत कुछ।
बेटा जो मर्जी आए सो कर। तेरा ये बाप तेरे हर फैसले में तेरे साथ है।
रावी को शतंरज खेलना बहुत पसंद था, बस उसने उस क्षेत्र में अपने-आपको आजमाना शुरू किया। वह स्टेट-लेबल की प्लेयर बन गई। अब वह सोच चुकी थी कि जिंदगी का एक-एक पल भरपूर जिएगी। वह समाज-सेवा के कार्य में भी संलग्न हो गई। झोंपड़-पट्टियों में जाती, वहां के लोगों को बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करती । सड़कों-फुटपाथों पर उसकी निगाह ऐसे बच्चों पर लगी रहती जो भीख मांग कर रहे होते...उसके कारण न जाने कितने बच्चे भीख मांगने जैसे कार्य से मुक्त हुए थे। बाल श्रम के खिलाफ भी उसकी मुहिम जोरों पर चल रही थी।
वह भले ही व्हीलचेयर पर थी पर उसकी सोच आसमान की बुलंदियां छू रही थी। उसकी एक पहचान बन चुकी थी। उसे कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके थे।
पिता उसके हर फैसले में सुदृढ़ स्तंभ के रूप में उसके साथ खड़े थे लेकिन.वह दिन भी आ गया, जब पिताजी का इस संसार से जाना निश्चित था, उनकी आंखों में रावी के लिए एक डर और चिंता स्पष्ट झलक रही थी। एन जी ओ के बहुत से लोग एक परिवार की तरह रावी के साथ खड़े थे, तभी पिताजी ने दीपेन्द्र को इशारे से बुलाया (वह भी दिव्यांग था, उसके जन्म से दोनों हाथ नहीं थे, पर वह रावी के साथ तबसे जुड़ा था, जबसे रावी नेअपना एनजीओ खोला था और उसने रावी के साथ हर मुसीबत का डट के सामना किया था) दीपेन्द्र !मुझसे वादा करो कि तुम सदा मेरी रावी का ख्याल रखोगे !
हां सर! आप रावी को अकेला न समझें, हम सब उसके साथ हैं, आखिर आपके और रावी के कारण ही हमें पहचान मिली है। (दीपेन्द्र एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गंवा चुका था, उसके परिवार में भाई-भाभी थे, जिनके लिए वह बोझ बन गया था, सो हमेशा तिरस्कार ही पाता था।
एक दिन वह पेपर में रावी के एनजीओ की जरूरी सूचना पढ़कर यहां आ गया, तबसे यही है, उसके हाथ भले ही न हों, लेकिन वह अपने सारे कार्य खुद ही करता था। यहां
वह बच्चों को खेल का प्रशिक्षण देने लगा। अब वह एनजीओ का विशिष्ट अंग था। )
नहीं दीप ! मैं चाहता हूं, तुम सदा रावी के साथ रहो, बोलो बनोगे उसके हमसफ़र!सांसें टूट रही थी। दीप ने पथराई हुई रावी के माथे को चूम कर पिता को आश्वस्त कर दिया था कि अब यह साथ कभी नहीं छूटेगा।
पिताजी चले गए। रावी और दीप अपने एनजीओ के लिए जी-जान से खड़े रहे। उनके एनजीओ की शाखाएं अब देश के कई शहरों में थी। लावारिस-दिव्यांग, बालश्रमिक,
मानव-तस्करी से छुड़ाए गए बच्चों की पनाहगाह बन गया था , उनका एनजीओ।
पत्थर को तराश कर नगीना बनाने का काम जोरों पर था। उनके इस कार्य के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पुरस्कृत भी किया गया था। रावी अब कोई दिव्यांग या दया की पात्र नहीं थी, बल्कि आश की ज्योति थी जो अंधेरे जीवन में उजाला लाने का कार्य कर रही थी।
