Lalit mohan Joshi

Romance

5.0  

Lalit mohan Joshi

Romance

आराधना

आराधना

6 mins
610


साठ के दशक की घटना है। रमेश अपने इण्टरव्यू में सफलता प्राप्ति के लिए अपने गांव के समीप वाले गांव के मंदिर में पूजा के लिए गया था। मार्ग में रमेश को एक लड़की दिखी जिसे देखकर वह मुग्ध हो गया। यहीं से उसकी जिंदगी का रास्ता बदल गया। वह इण्टरव्यू की बात छोड़कर उस लड़की के बारे में ही सोचने लगा। उसका मन उसी में डूब गया। रमेश अपने गांव के एक सम्पन्न परिवार का बेटा था, इसीलिए उसे उस जमाने में शिक्षा प्राप्त हुयी। दो गांवों के मध्य की दूरी मात्र एक से डेढ़ मील रही होगी।

रमेश ने उस लड़की के बारे में गांव का एक चक्कर लगाकर अपनी जिज्ञासा पूर्ण कर ली। लड़की का नाम था आराधना। रमेश यह अवश्य जान गया था कि आराधना से उसका रिश्ता नहीं हो सकता क्योंकि दोनों के मध्य जाति की दीवार खड़ी थी। यह वह समय था जब जाति के बंधनों को तोड़ना अति मुश्किल था। रमेश आराधना पर मुग्ध हो चुका था।

वह रोज मंदिर जाता। शिव के मंदिर में जाकर वह एक दो घंटे ध्यान लगाता और फिर अपने गांव लौट आता। यह काम वह रोज करता था क्योंकि कभी कभी उसे मार्ग में आराधना के दर्शन हो जाते थे। वह मात्र उसे देखकर ही आनन्दित हो जाता था।यह क्रम उसका नित्य का हो गया था। एक दिन रमेश के पिता ने कहा, “ रमेश! अब तुम्हें कुछ काम करना चाहिए। नौकरी न सही मगर खेती का काम करो।”

रमेश ने कहा, “ पिताजी! नौकरी मैं न कर सकूंगा। कृषि कार्य में सहयोग अवश्य कर दूंगा। मैं अपने गांव और घर को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता। गांव से बाहर जाने में अनजान भय लगता है।”

पिताजी उसकी बात सुनकर चुपचाप अपने कमरे में चले गए। रमेश रोज सवेरे स्नान कर पड़ोस के गांव के मंदिर जाता और वहां पहुंच कर ध्यान मग्न हो जाता। उसका ध्यान कहां रहता था,वह खुद भी नहीं जानता था। गांव के लोग उसे रोज देखते मगर वह कभी किसी से कुछ न पूछता और न कोई बात करता। मंदिर में ध्यान लगाकर वह चुपचाप घर लौट आता। यह क्रम उसकी जिंदगी की सामान्य हिस्सा बन गया तो लोगों ने भी उसपर ध्यान देना छोड़ दिया। रमेश के दो रूप हो गए थे, एक मंदिर में ध्यान मग्न रमेश और दूसरा घर में चुपचाप रमेश।।

जब कभी उसकी मां उससे विवाह की बात करती तो वह कह देता, “ विवाह उसके भाग्य में नहीं है। वह केवल ईश्वर में ध्यान लगाएगा।”

कोई किसी से जबरदस्ती नहीं कर सकता। परिवार वालों ने भी उसके रवैये को देखकर उसे उसकी मर्ज़ी पर छोड़ दिया। आखिर उसकी मर्जी थी ही क्या--सवेरे जाकर मंदिर में ध्यानमग्न होना। कुछ लोग तो यहां तक कहने लगे कि यह या तो साधु या महात्मा बन जाएगा।

वह रोज क्यों जाता था,यह वही जानता था।

कभी कभी आराधना दिख जाती तो वह नजरें अलग कर लेता ताकि उसे कुछ भी मालूम न हो सके। वह नहीं चाहता था कि कोई उसके मन की बात जानें।

एक दिन रमेश को ज्ञात हुआ कि आराधना का विवाह उसी के गांव के एक व्यक्ति के साथ हो रहा है तो वह बहुत खुश हुआ। इसी गांव में रहेगी। एक घर से दूसरे घर चली जाएगी मगर उसे ‌आराधना के दीदार होते रहेंगे। इन्हीं विचारों में ‌वह खोया रहता। उसके जीवन का एक मात्र उद्देश्य रह गया था आराधना के‌‌ दर्शन प्राप्त करना।

समय बीतता गया। पांच वर्षों के अंतराल में न केवल आराधना का विवाह हुआ बल्कि वह दो बच्चों की मां भी बन गयी। सुअवसरों पर जब भी आराधना मंदिर आती तो रमेश उसे कनखियों से देख लेता। आखिर वह आता ही इसीलिए। उसने अपने परिधान भी बदल लिए थे। गेहुए वस्त्र धारण करने के साथ साथ-साथ उसने दाड़ी और बाल भी बड़ा लिए थे। अब लोग उसे साधु समझने लगे थे। आखिर छोटी जगह में सभी जानते थे कि वह पड़ोंस के गांव

का है। एक बार एक व्यक्ति ने उससे पूछ लिया कि आप यहां नित्य आते हैऔर ध्यान लगाते है।आप ऐसा क्यों करते है। रमेश ने उसकी बात सुनकर कहा कि मुझे लगता है कि यदि मैं इस मंदिर में नहीं आऊंगा और पूजा अर्चना तथा ध्यान नहीं करूंगा तो अजीबोगरीब परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएंगी। मेरे मन में एक अजीब भय बना रहता है। मैं आशंकाओं से घिरा रहता हूं। हर रात मुझे स्वप्न में यही मंदिर दिखायी‌‌ पड़ता है और आवाज गूंजती है कि जाओ मंदिर में। शिव में ध्यान लगाओ। इतना कहकर रमेश आगे बढ़ गया। कितना बड़ा झूठ कहा था उसने। मन की बात तो वह किसी से कह तो पाया नहीं और मिथ्या बातों के सहारे जीने लगा।

रमेश के जीवन में उम्र के अलावा कोई और परिवर्तन नहीं आया। उसका मंदिर में ध्यान का क्रम निरन्तर जारी रहा। केवल दो घंटे का ध्यान। एक दिन आराधना अपने बच्चों के साथ मंदिर आयी और ध्यान में मग्न रमेश के पास एक फल 

रख दिया। फल गिर गया और रमेश का ध्यान टूटा तो उसने सामने आराधना को पाया। उसका ध्यान टूटता देखकर आराधना बोली, “ क्षमा कीजिएगा। मेरे कारण आपका ध्यान भंग हुआ। आज मेरे‌ बेटे का जन्म दिन है इसलिए एक फल आपके पास रख दिया। हम आपको यहां पर ध्यान ‌लगाते हुए ‌पाते है। यह मेरे बेटे आशु और दीपक है। साथ में मेरे पति अभय है। हम सबको आशीर्वाद दीजिए।”

रमेश कुछ कहता या न कहता मगर‌ उसने अपने हाथों से आशीर्वाद दे दिया। इतने वर्षों में उसने पहली बार आराधना की आवाज सुनी। अदभुत सुख का अनुभव किया। कितना गहरा लगाव हो गया था उसे आराधना से। रिश्ता नहीं, नाता नहीं, बात नहीं मगर फिर भी निरन्तर बना हुआ आकर्षण। इतने वर्षों के पश्चात भी उसके मन में आराधना की प्रथम छवि ज्यो की त्यो बनी हुयी थी। कुछ भी मन मस्तिष्क में नहीं बदला था।वह उससे अपने को अलग नहीं कर पाया था।

जिन्दगी गुजरती जाती है। लोग आते जाते रहते हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी बन जाती है। समय बदलता है। आराधना के बच्चे बड़े हो गए थे और शायद कहीं बाहर चले गए थे। तीस वर्षों का समय रमेश ने इसी क्रम में व्यतीत कर दिया।

एक दिन जब वह ध्यान मग्न था तो आराधना ने उसका ध्यान भंग करते हुए कहा, “ अब मैं और अभय अपने बेटों के पास जा रहे हैं। जबसे आपने हमें आशीर्वाद दिया है तबसे हमारे जीवन में सुख की वर्षा होने लगी है। आज एक बार दुबारा आपसे हम दोनों आशीर्वाद लेने आए हैं। पता नहीं इस गांव में कब आना हो।”

रमेश ने अपने हाथ खड़े करके आशीर्वाद दिया और पहली बार कहा, “ खुश रहो।”

आराधना और अभय दोनों ने रमेश को प्रणाम किया और फिर चले गए। रमेश ने पहली बार अपने चरणों में आराधना की उंगुलियो का स्पर्श महसूस किया। वर्षों पहले दीदार, फिर आवाज और अब स्पर्श।

रमेश को लगा कि उसने जीवन का अमृत पी लिया है। अब उसके मंदिर में आने कोई मकसद नहीं रह गया था। वह नहीं चाहता था कि कोई उसके मन की बात जानें। एक दिन उसने निर्णय लिया कि अब वह यहां से चला जाएगा। अब वास्तव में ध्यान लगाऊंगा। वह हिमालय के मार्ग पर निकल पड़ा बिना किसी को बताए मगर उसकी आंखें नम हो रही थी।


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