आखिर कब तक

आखिर कब तक

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माँ उन्हें आने दो। दीपक ने मुझे पसंद किया है। वही मेरे पास प्रस्ताव लेकर आया था। मैं तो उसे जानती भी नहीं थी। पता नहीं कब उसने मुझे देखा और अपनी बात कह दी। मैंने भी उसे अपनी सारी बातें और शर्तें बता दी हैं। उनकी मर्ज़ी है हाँ करें या ना। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। ‘मैं जैसी हूँ वैसी ही रहूंगी' नेहा ने जवाब में कहा। 'अरे समाज में कुछ बातों व रीति रिवाज़ों को मानना पड़ता है। हमेशा अपनी ही चलाने से काम थोड़े ही बनता है।' माँ ने अपनी बात ज़ोर देकर कही।

खैर माँ के बार-बार ज़ोर देने पर नेहा किसी तरह तैयार हो गयी। शाम के पांच बजे के समय दीपक के माँ और पिता नेहा के घर पहुंचे तो नेहा के पिता और माँ ने उनका स्वागत किया। माँ ने हाल चाल पूछने के बाद पूछा, ‘दीपक नहीं आया क्या ? दीपक के पिता अभिषेक ने बताया कि उसने कहा आप लोग ही बात कर लें। मैंने ही तो नेहा को तलाशा है। दीपक तो विवाह से दूर भागता था। यदि कोई वैवाहिक प्रस्ताव आता तो उसे मना कर देता। अब पसंद उसकी है, हम तो मात्र औपचारिकता पूरी करने आये हैं। बातचीत का सिलसिला चलता रहा, तभी नेहा आयी और नमस्कार करके सामने बैठ गयी। दीपक की माँ रक्षा ने नेहा से पूछा, ‘क्या तुम्हें दीपक पसंद है? दीपक ने तुम्हारे बारे में कई बातें बताई है।’ नेहा कहने लगी, 'मुझे दीपक ने पसंद किया है। उन्होंने ही विवाह का प्रस्ताव रखा। मैं नौकरी करती हूँ और वह भी एक अच्छे पद पर है। मैं अपने हिसाब से रहने की आदी हूँ। बचपन से ही मुझे हॉस्टल भेज दिया गया था। घर तो मैं छुट्टियों में ही आती थी। मुझे केवल अपने काम से मतलब है। घरेलू काम मुझे बहुत कम आते हैं और न ही उन्हें करने में मेरी कोई रूचि है। मैं किसी के साथ एडजस्ट करने में बहुत परेशानी महसूस करती हूँ। मैं आपके साथ भी एडजस्ट नहीं कर पाऊँगी। मैं अकेले रहना पसंद करती हूँ तथा मुझे कोई टोके, यह भी मुझे कतई पसंद नहीं है। मैं आपसे स्पष्ट कहना चाहती हूँ कि विवाह के पश्चात मैं और दीपक अलग रहेंगे। मैंने सारी बातें दीपक को पहले ही बता दी हैं ताकि बाद में कोई शिकवा शिकायत न रहे। मेरा आपसे अनुरोध है आप इस बात को अन्यथा मत लीजिएगा। आपसे मेरे संबंध हमेशा अच्छे बने रहेंगे,’कहकर नेहा चुप हो गयी।

दीपक के माँ पिताजी नेहा के बारे में यह तो जानते थे कि वह एक स्वतंत्र विचारों की लड़की है लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि नेहा विवाह के पश्चात हमारे साथ नहीं रहेगी। वह सोचने लगे तभी नेहा ने फिर कहा, 'आप आराम से सोचिये। निर्णय सोच समझ कर लिया जाना चाहिए ताकि बाद में कोई परेशानी या तनाव न हो।' इतना कहकर वह दूसरे कमरे में चली गयी. नेहा के माँ पिता भी अंदर चले गए ताकि दीपक के माँ पिता आपस में बातचीत कर निर्णय ले सकें। दीपक की माँ ने सोचा और कहा कि नेहा की बात मान लीजिये, हमारा बेटा भी तो बड़ी मुश्किल से विवाह के लिए तैयार हुआ है। लड़की अच्छी है और उसी की पसंद की है। धीरे धीरे जब परिवार में बच्चे आ जाएंगे तो सब कुछ सामान्य हो जाएगा। इस पर दीपक के पिता ने हामी भर दी और नेहा से कहा, 'हम तुम्हारी सारी बातें मानते हैं। परन्तु हमारी भी एक शर्त है की तुम हमारे घर के पास ही अपना घर लेकर रहेगी ताकि हम दीपक और तुमसे मिलते रहे’। इस पर सहमति हो गयी। कुछ दिनों बाद एक सामान्य समारोह में दीपक और नेहा का परिणय हो गया। मात्र कुछ ही लोगों को विवाह में सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया गया। दीपक और नेहा ने अलग फ्लैट ले लिया और उसमें रहने लगे यह फ्लैट दीपक के माँ बाप के मकान के पड़ोस में था। नेहा विवाह के बाद भी अपनी मर्ज़ी से रहती तथा अपने काम में ही व्यस्त रहती। लेकिन उसमें एक गुण था कि वह पारस्परिक सम्बन्धों को हमेशा सामान्य रखती थी। अक्सर ऑफ़िस से लौटते हुए वह अपने सास-ससुर से मिलने जाती और उनके हाल-चल मालूम कर लेती। कभी-कभी वह उनके लिए उपहार या अन्य सामान भी ले जाती लेकिन उनके साथ वह कम ही समय गुजारती। यही क्रम उसने अपने मायके के साथ भी बना रखा था।

नेहा को स्वतंत्र ज़िन्दगी बिताने की आदत हो चुकी थी। कभी-कभी उसके सास-ससुर तथा माँ-पिताजी उसके घर पहुँच कर उसका हाल-चल जान लेते। नेहा अधिकांश समय अपने ऑफ़िस के कार्य में ही व्यस्त रहती। दीपक के माता-पिता ने भी इस बात से संतोष कर लिया कि उनका बेटा ख़ुशी से रह रहा है तथा कम से कम बहु हाल-चल तो मालूम कर लेती और आती जाती रहती है। उनका विश्वास था की दीपक और नेहा की सन्तान होने के बाद वह लोग साथ रहने लगेंगे। एक दिन शाम को नेहा के माँ-पिताजी अपने समधियाने में आये और परस्पर बात-चीत होने लगी। नेहा के पिताजी ने कहा, 'इसे बचपन से हॉस्टल भेज कर ग़लती हो गयी, यह एकदम स्वतंत्र विचारों की हो गयी है। लगता है इसका हम लोगों से लगाव कम हो गया है। यह विवाह के पहले भी ऐसे ही रहती थी। साथ रहते हुए भी घर में इसकी उपस्थिति का कभी भी आभास नहीं होता था। यह अपने में ही रहती।' नेहा के ससुर ने बातचीत को जारी रखते हुए कहा, 'जो हो गया सो हो गया, लेकिन नेहा समझदार है, आपसे व हमसे मिलती रहती है। दीपक भी आते जाते रहता है। साथ साथ भी आते हैं। नहीं तो आज कल बहु बेटों के पास माँ बाप के लिए समय कहाँ रहता है। कभी कभी तो बेटे अपने माँ बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आते है यहाँ ऐसी स्थिति तो नहीं है। हम लोग भी अपनी तरह से जी रहे हैं।’

इस तरह की बातें चलती रहीं, समय के साथ यही क्रम निश्चित हो गया। तीनों परिवार यह महसूस करते हैं की दूर रहते हुए भी वह पास पास हैं। एक बार नेहा और दीपक घूमने गए। वहां एक महात्मा जी का सत्संग हो रहा था। नेहा ने कुछ समय वहाँ सत्संग में व्यतीत किया। महात्मा जी प्रवचन में कह रहे थे कि वही व्यक्ति महान है जो दूसरों को ख़ुशियाँ दे सके। अपने लिए तो हर कोई आनंद तलाशता है। दूसरों को आनंद देने वाला ही सच्चा मानव है।

शायद नेहा को महात्मा जी के शब्द प्रभावित कर गए। घर पहुँचकर उसे लगा कि वह मात्र अपनी ख़ुशियों के लिए जी रही है। उसे लगा की उसने अपने सास-ससुर और माँ-पिताजी की ख़ुशियों का ज़रा भी ध्यान नहीं रखा। अगर वह उनके साथ रह लेती तो कौन सा फर्क पड़ जाता लेकिन अब वह कुछ कर भी नहीं सकती थी। जिन शर्तों को उसने खुद चुना था, उन्हें कैसे बदल दे। हाँ मुझे उन्हें ख़ुशी देनी चाहिए थी। यह एहसास नेहा को हो गया था, जीवन का क्रम इसी तरह चलता रहा लेकिन नेहा एक ऐसे अवसर की तलाश में थी जब वह दीपक के माँ-पिताजी की एक साथ रहने की बात मान लेती। कुछ समय बाद नेहा प्रेग्नेंट हुई। एक दिन उसने एक बिटिया को जन्म दिया तो सभी ने कहा इस अवसर पर एक समारोह हो जाये। लोगों को डर था कि नेहा मना न कर दे। जब प्रस्ताव आया तो नेहा ने उस प्रस्ताव को मान लिया। नेहा अब सबको ख़ुशियाँ देना चाहती थी। दीपक और नेहा के माँ-बाप छोटी बिटिया की देख-भाल करते तभी नेहा और दीपक ऑफ़िस जा पाते। एक दिन दीपक की माँ ने कहा, 'अब बिटिया को हमारे यहाँ रख दो, हमारा मन लगा रहेगा। तुम दोनों नौकरी पेशा हो इसे हम देख लेंगे। शाम को तुम ऑफ़िस से आते वक्त इससे मिल ले, इससे तुम्हारे काम में कोई बाधा भी नहीं पहुँचेगी।’नेहा ने कहा, 'केवल बिटिया ही नहीं, हम भी आपके साथ रहेंगे।'

आखिर कब तक वह अवसर तलाशती साथ रहने का।


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