आखिर क्यों ?भाग 5
आखिर क्यों ?भाग 5
अभी तक आपने पढ़ा....
"नहीं बेटा वहां तो बाकायदा मेला लगता है । इस उत्सव के बाद दर्शनार्थियों की बहुत भीड़ होती है । मां का अलग ही तेजस्वी रूप कहा जाता है । देश-विदेश से लोग यहां दर्शन को आते हैं । ये तो खोज का विषय हो सकता है आखिर यथार्थ क्या है ?
आगे का भाग पढ़े*****
1---असम का कामाख्या मंदिर *****
शक्तिपीठों का महापीठ कहा जाने वाला ये मंदिर तंत्र-मंत्र का मूल केंद्र कहा जाता है । कामाख्या मंदिर में प्रत्येक वर्ष "अंबुमाची उत्सव" मनाया जाता है । जो तीन दिवसीय होता है । यह 22 जून से 26 जून तक चलता है ।
पौराणिक, धार्मिक किवदंतियों से माना जाता है कि देवी कामाख्या तीन दिन को रजस्वला होती हैं । पूरी गुवाहाटी में कोई मंगल कार्य नहीं होते हैं, ना ही यहां का कोई मंदिर खुलता है ।यहां तक के मेले के पास ही बहती ब्रह्मपुत्र नदी का जल तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है । इस जल में स्नान करना पूर्णतया वर्जित होता है। यहां पर मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। उनको ओढ़ाये जाने वाले श्वेत वस्त्र लाल रंग के हो जाते हैं ।
"हमारे धर्मग्रंथों में इसका औचित्य बताया गया है । इसे पूर्ण प्राकृतिक शरीर संरचना से विवेचित किया गया है।इस मंदिर के रहस्य का मूल कारण जो भी रहा हो ।
"तो हम कैसे कह सकते हैं कि रजस्वला होना कोई शर्म या अपराध की बात है ।
मासिक धर्म वर्जित विषय नहीं । अंधविश्वास से परे सहजता से स्वीकार करना चाहिए। स्त्री की यही खूबी उन्हें पुरुषों से श्रेष्ठ साबित करती है "।
शिंजो "अरे मम्मी जी आपने बहुत शानदार जानकारी दी मुझे तो बहुत ही शर्मिन्दगी लगती थी "।
मधुरा "नहीं बेटा शिंजो शर्म तो उन्हें आनी चाहिए जिन्होंने इसे महिलाओं को शर्मिन्दा करने का हथियार समझ रखा है।"
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने 10 मार्च 23 को यही बात अपने भाषण में कही थी अगर लडकों को बचपन से अच्छी परवरिश मिले तो हम निश्चित रूप से सुनिश्चित कर सकते हैं कि भविष्य में महिलाओं के खिलाफ कोई हिंसा या लैंगिक अपराध न हो । इस जिम्मेदारी का निर्वहन जन्म दायिनी मां ही कर सकतीं हैं ।
"अपने बच्चों को इसे सहज-सरल रूप में अवगत कराना हमारा दायित्व बनता है । यही भारतीय संस्कार व संस्कृति की विशेषता राज करने आये विदेशियों ने तर्क के साक्ष्य मिटा दिये । दादी जी अपनी जगह सही हैं बस अपनी बात तर्क की कसौटी से कस नहीं सकीं" ।
दक्षिण भारत में होने वाले उपरोक्त उत्सव एक ऐसी शिक्षा का क्रम है जो पीढ़ी दर पीढ़ी, पारिवारिक सामाजिक रूप से शारीरिक ,मानसिक और भावनात्मक परिवर्तनों के बीच तालमेल बिठा ,तैयार कर आगे का रास्ता आसान करते हैं ।
इसे लड़की एक अभिशाप न समझ वरदान रूप में देखती है । तनाव या बीमारी के रूप में नहीं वरन् नारीत्व को खुले मन से स्वीकार कर उसे
महत्वपूर्णता की पहचान कराई जाती है ।
मासिक धर्म को रजः स्त्राव नाम संस्कृत ग्रंथों में मिलता है । रज का अर्थ रक्त प्रवाह से लिया गया दार्शनिक रूप में रजोगुण से संदर्भित किया जाता है । इसे एक प्रकार की तपश्चर्या कहे तो अतिशयोक्ति न होगी ।
इसके अभ्यास से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण विकसित करके आत्म शुद्धि का एक सुनहरा अवसर प्राप्त किया जा सकता है । एकांतवास अंदर सोचने का एक सुनहरा अवसर है । अनुसंधानों से पता लगा है कि स्त्रियों को मासिक धर्म होने के दौरान हार्ट अटैक की संभावना दर कम पाई गई
है ।
इसका वर्णन व नियम हमारे भविष्य पुराण, मनुस्मृति ,बौद्धायन धर्मसूत्र में भी बताए गए हैं । यह पूरी तरह अपवित्र अवस्था नहीं है । क्योंकि ये अस्थाई अशुद्धता को दूर कर शरीर को स्वस्थ्य रखने में सहायक है । यही बात याज्ञवल्क्य स्मृति, वशिष्ठ धर्मसूत्र में रजस्वला परिचर्या में कही गयी है ।
आयुर्वेद में त्रिदोषों के महत्व को प्रत्येक आयुर्वेदाचार्य बताते हैं ।इन्हीं तीनों वात, पित्त ,कफ के संतुलन असंतुलन से हमारा जीवन स्वास्थ्य निर्भर व निर्धारित होता है ।
वात प्रकृति वाली को उस समय दर्द , ऐंठन ,चीभन होती है । पित्त प्रकृति में मूड (स्वभाव में बदलाव ) होना पाया जाता है ।कफ प्रकृति वालों में इस समय अधिक थक्के बनते हैं व शरीर में भारीपन रहता है ।
इससे हम आने वाले गर्भधारण की स्थिति की तैयारी भी कर सकते हैं जिससे बच्चे निरोग और स्वस्थ हो सकते हैं ।"
सिया "मम्मी जी इन दिनों में दादी जी नहाने को क्यों मना करती हैं "।
मधुरा "बेटा सिया दादी जी नहीं, हमारे धर्म शास्त्रों में भी महिलाओं के पीरियड्स के दौरान न नहाने की, मंदिर और रसोई में न जाने की बात कही गई है। दरअसल हमारे शास्त्रों में ऐसी कई बातें बताई गई हैं । जिनके बारे में हमें पूरी जानकारी न होने पर भी हम उनका अंधानुकरण सदियों से करते आ रहे हैं।"
जबकि वह उस देशकाल के समयानुसार लिखी गयीं थीं । उनमें से एक यह कि मासिक में 4 दिन नहाना नहीं चाहिए पांचवे दिन सिर धुलना चाहिए। इसका कारण पढ़ें शेष अगले भाग में तर्क-वितर्क के साथ ।
