आदर्श सन्यासी
आदर्श सन्यासी
"और कहिए शगुन जी कैसी है आपकी नयी बहू?" व्यंग्यात्मक लहजे में विनीता ने पूछा।
"अच्छी है।" शगुन ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।
"कश्मीरन है ना।" विनीता ने दूसरा प्रश्न उछाल दिया।
" हाँ, ये तो सबको पता है, रिसैप्शन में तो आप भी गई थी ना।" जवाब सरला ने दिया था।
"अब छोड़ो भी, कोई और बात करते हैं।" सरला ने बात बदलते हुए कहा।
"नहीं कोई बात नहीं ज़रा सुने तो सही विनीता जी आखिर हमसे कहलवाना क्या चाहती हैं?" शगुन ने मुस्काते हुए कहा।
सकपका सी गई विनीता।
"अरे पड़ोसी हैं, इतने सालों का साथ है अपना, अच्छे से जानते हैं एक दूसरे को, अब अगर इनकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई तो पेट गुड़गुड़ करेगा इनका।" माहौल को हल्का करने की गरज से शगुन बोली।
"हाँ मैं वो...।" विनीता ने शर्मिंदा सी होते हुए बोली।
"पूछिये।"
"आप..आपकी रसोई में प्याज भी नहीं आता, और आपकी बहू वो तो...।"
"अच्छाsss तो इस बात ने आपको परेशान कर रखा है।" शगुन के मुँह से निकला।
"हाँ खाती है ये सच है, जिस माहौल से प्रीति आई है, वहां माँस खाना बुरा नहीं माना जाता,और दूसरा सच ये भी है कि वो कभी घर पर ऐसा खाना नहीं बनाती। जिस दिन उसे खाना होता है मुझ से पूछ कर बेटे के साथ चली जाती है। इसमें कोई बहुत बड़ी बात भी नहीं, मेरा जैसा मन करता है मैं खाती हूँ, और बच्चों को जो अच्छा लगता है वो खा लेते हैं, बस एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करो, भई घर में शान्ति रखने का अपना तो यही मंत्र है।" शगुन ने सधे शब्दों में जवाब दे दिया।
"बढ़िया है आपका मंत्र, और हर समस्या का हल होता है आप के पास एक पहुँचे हुए संन्यासी के जैसे।" विनीता ने हँसते हुए कहा।
"अरे घर से फोन आ रहा है चलती हूँ।" कह कर शगुन उठ खड़ी हुई।
"कई बार मैं भी शगुन जी से यही कहती हूँ।" सरला ने कहा।
"क्याssss?"
"के उनको तो संन्यासी होना चाहिए था कहाँ गृहस्थी के जंजाल में फँस गयी।"
"सरला जी वो आज भी संन्यासी ही है।" शगुन के घर की ओर देखते हुए विनीता ने कहा।
