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Archana kochar Sugandha

Tragedy

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Archana kochar Sugandha

Tragedy

आधुनिक युधिष्ठिर

आधुनिक युधिष्ठिर

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आवाम का कोलाहल और ऊँचे-ऊँचे नारों का शोर--- हमारा राजा कैसा हो-- महाराज युधिष्ठिर जैसा हो---का विजय जुलूस, मैं मौन और स्तब्ध सड़क किनारे खड़ा देख रहा था। तभी युधिष्ठिर महाराज, मेरे बाल सखा किशोर, आकर मेरे गले मिलते हुए, "यार! पर्याप्त सबूतों और गवाहों के अभाव में, मैं कोर्ट से बाइज्जत बरी होकर आया हूँ। पूर्ण सत्यवादी, सत्यनिष्ठ और पाठ की गहराई में खोने वाला, झूठ तो क्या--- उसकी परछाई से भी कोसों दूर , अगर गलती से पैर के नीचे आकर कोई चींटी मर जाए, तो कई रातों तक न सो सकने वाला, जिसे हम मजाक-मजाक में आधुनिक युधिष्ठिर बुलाते थे- भाई यह माजरा क्या है---?" वह मेरे कान के निकट कुटिलता से मुस्कुराते हुए--" यह सब तो तुम लोगों की बदौलत, मेरे सत्यवादी और सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर के कर्मों का ही प्रतिफल हैं। मेरे किशोर से युधिष्ठिर, युधिष्ठिर से महाराज युधिष्ठिर बनने तक के सफर में, मेरे दामन पर लगे सत्यपन के लेबल का कमाल है। लोग मेरे कुकर्मों को नजरअंदाज कर देते हैं और मैं युधिष्ठिर की आड़ में उन्हें अंजाम देकर, बड़ी सफाई से सच को झूठ के आवरण पहनाकर, बड़े जोर-जोर से बोलता हूँ"-- अश्वथामा मर गया और मन ही मन बड़बड़ाता हूँ--- "पुत्र नहीं, हाथी। "


 


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