Babu Dhakar

Classics Inspirational


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Babu Dhakar

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आधी धूप व आधी छांव

आधी धूप व आधी छांव

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कमलकांत और कस्तुरी नाम के दंपति अपने गृहस्थ जीवन को आधी धूप और आधी छांव में जैसे तैसे पांच साल से ढोते आ रहें हैं। वैसे गृहस्थी को चलाने के लिए कोई काम तो करना ही पड़ता है, तो कमलकांत और कस्तुरी दोनों मिलकर कृषि करते हैं यानि कि किसान है, ऐसा नहीं कि कमलकांत जी के कोई भाई ना था,दो भाई थे जो मिलकर रहते थे।और क्या किस्मत पाई थी दोनों ने जो एक ही दिन बस दस मिनट के अंतराल में बिजली के करंट लगने से भगवान को प्यारे हुए और अपने पिछे अपने मात्र दो व तीन साल के बेटे कमलकांत जी के सहारे छोड़ गए, यहां कहना पड़ेगा कि भगवान ने पहले मरने वाले से शायद कोई इच्छा प्रकट करने को कहा होगा तो अपने लाडले भाई को साथ में लाने का वरदान मांगा होगा, खैर जो हूआ अच्छा नहीं हुआ क्योंकि जाने वाले लौट कर भी नहीं आते पर खेती किसानी का सारा काम अब कमलकांत और कस्तुरी दोनों पर आ पड़ा। और तो और कमलकांत सबसे बड़े भाई थे तो उनके दोनों भाइयों के परिवारों की जिम्मेदारी भी कुछ हद तक इन्हीं को पुरी करनी थी। अब चलते हैं कहानी शुरू करते हैं कमलकांत जी के आवास से जहां दोनों भाइयों के शव रखें हैं और इनके चारों और गांव के लोग मातम मना रहे हैं तभी गांव के मुखिया रामसुख जी (जो कि अंहकारी आदमी है) आते है,

रामसुख - अरे भाई कमलकांत ! यह क्या हो गया है, मैंने कहा था ना कि घर के पास बिजली के नंगे तार नहीं लगवाने चाहिए थे।

कमलकांत (पहले मन ही मन आंसुओं संग बुदबुदाता है कि किसी भी पद पर आ जाये कोई तो गलती सामने वाले की ही बताता है ) - नहीं मुखिया जी मैंने तो ....(बस इतना कहा  और गले से कोई शब्द नहीं निकले)

रामसुख- अरे भाई थोड़ा धीरज धारण कर,होनी को तो कौन टाल सकता है।(इसी बीच कमलकांत जी के दोस्त रमेश और रामसुख जी के भाई मनसुख जी का प्रवेश )

मनसुख- अरे दादा अब बस भी करो, इनको अपने हाल में रहने दो,अब हमें भी इनके दाह संस्कार की तैयारी करनी चाहिए। वैसे भी नंगे तारों को कब का हटा दिया था पर शोर्ट सर्किट होने से एक के करंट लगा और दुसरा थोड़ा घबराहट में जल्दी जल्दी छुड़ाने बिना जूतों के ही चला गया।

रमेश-हां काका आप ठीक कहते हैं।( इस तरह मनसुख जी, रमेश जी और गांव के लोगों द्वारा अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की और जो भी बारह तेरह दिन तक के जो रीति रिवाज थे सब अच्छे से पुर्ण हो गये,अब असली समस्या जो आने वाली थी वो थी खेतों में रबी की फसल की बुवाई करने की क्योंकि खरीफ सीजन में तो बरसात से जैसे तैसे फसल तैयार हो गई थी और रिश्तेदारों और गांव वालों ने हाथों हाथ कटवा कर कमलकांत जी के घर तक पहुंचा भी दी थी,पर अब रबी में इनके स्वयं के खेतों में बुवाई के अलावा इनके दोनों भाइयों के खेतों में भी बूवाई करनी थी तो इस बारे में कस्तुरी और कमलकांत आपस में चर्चा करते है )

कमलकांत- अरे सुनती हो ! रमाकांत की मां जरा यहां तो

आओ

कस्तुरी(आ कर)-क्या हुआ आज सुबह सुबह ही क्या जरूरी काम जो मुझे बुला रहे हो

कमलकांत- देखो! हमें अब फसल की बुवाई के बारे में सोच लेना चाहिए।

कस्तुरी-सोचने से क्या होता है, हम अपने खेतों में बुवाई कर लेते हैं और दोंनो देवर जी के खेतों में किन्हीं दूसरों को बुवाई के लिए कह देते हैं जो कि फसल उत्पादित कर आधी फसल दौनो देवरानीयों को सौंप देंगे।

कमलकांत- नहीं भाग्यवान! हम ऐसा करते हैं कि हम अपने स्वयं के खेतों को दुसरों को बुवाई के लिए सौंपे जो हमें आधी फसल दे देगा, और हम दोनों मिलकर मेरे छोटे भाइयों के खेतों की बुवाई करते हैं क्योंकि ऐसा करने से तुम्हारी देवरानीयां भी संग में कार्य करेगी और मिलकर कार्य को जल्दी समाप्त भी कर लेंगे, तो इस बारे में तुम क्या कहती हो।

कस्तुरी -जी! जो आप कहो वो उचित है और मैं इस बारे में अपनी देवरानियों से बात कर लूंगी,पर खेतों को सींचने के लिए क्या करेंगे।

कमलकांत- इसके लिए हमें कर्ज लेकर एक ट्यूबवेल लगवानी होगी क्योंकि इस साल बारिश बहुत कम हुई है तो भूजल स्तर बहुत ही गहरा हो गया है।

कस्तुरी- ठीक है जो आपको उचित लगे वो करो पर कहीं ऐसा ना हो हम कर्ज के बोझ से दब जाये।

कमलकांत- नहीं भागवान! ऐसा नहीं होगा क्योंकि हमें अगर थोड़ा समय मिलेगा तो कहीं मजदूरी भी करते रहेंगे ‌।

कस्तुरी - तब तो ठीक है,मैं अब जाती हूं,कर्ज बहुत ही सोच समझ कर लेना जी! कहीं बाद में पछताना ना पड़े।

कमलकांत-ठीक है।

""पर कहते हैं ना जो इंसान या यूं कहें कि किसान जो सोचता है वैसा ही हो जाये तो क्या कहना, यहां समय भी किसी चिड़िया का नाम है ना, हुआ यूं कि कमलकांत के जो खेत थे वे दरअसल कमलकांत के नाम ना होकर उसके भाइयों के नाम थे और कमलकांत के दोनों भाईयों के एक एक बेटे जो थे वे दोनों कमलकांत के कारण ही वकील बन गये तो उन्होंने कमलकांत जी पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया कि इन्होंने हमारे साथ धोखा किया है, इन्होंने हमारे खेत छीन लिए।

वो तो भला हो उन वकीलों की मांओं का जिन्होंने बात पलटकर कहा कि ये तो हमारे कहने पर सब खेतों में बुवाई कर दिया करते थे और अब हमारे कहने पर हमारे खेत हमें नहीं दे रहें, तब सबुतों के तौर पर कानुनी कार्यवाही हुई और कमलकांत जी का स्वयं का खेत भी छीन लिया लेकिन मुखिया जी के हस्तक्षेप से वे कम से कम जेल जाने से तो बच गए, और अब कमलकांत जी के पास बचा तो उनका बेटा रमाकांत और वो क़र्ज़ जिसे उनको चुकाना था"

इसी तरह उनका जीवन नर्क में बीत रहा था पर कहते हैं कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं, आगे हुआ यूं कि मुखिया जी की नजर रमाकांत पर थी क्योंकि उनके कोई लड़का नहीं था और रमाकांत जैसा सरल एवं ईमानदार पुरे गांव में नहीं था। वह पढा़ लिखा तो था ही पर अपने सरल स्वभाव से इंटरव्यू में पास ना हूआ था वरना पटवारी भी बन सकता था, तो उन्होंने उसे अपने यहां नौकरी पर रख लिया और आगे चलकर हुआ यूं कि उसने अपने चचेरे भाइयों से बदला नहीं लिया बल्कि मुखिया जी का दिल जीत लिया,और मुखिया जी ने उसे अपना उत्तराधिकारी और गांव का मुखिया घोषित कर दिया। अब कमलकांत जी और कस्तुरी के जीवन में धूप ही धूप थी।


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