Babu Dhakar

Others


3.5  

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जुल्मों का कुआँ

जुल्मों का कुआँ

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रोहन और मोहन वर्तमान में दो अच्छे दोस्त है अर्थात ये पहले दोस्त थे ,और एक छोटी सी लड़ाई से सात साल तक एक दूसरे के दुश्मन रहे और अब बहुत दिनों बाद मिले तो अनायास ही मंद मंद मुस्कूरा कर अब दोस्त से गहरे दोस्त हो गये क्योंकि ऐसे ही विचार जो एक दूसरे के पिछले असंग के कारण दोनो में विकसित हो गये थे यानि कि दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता महसूस हो गयी थी, दोनों कमरे में चाय के साथ इस प्रकार आपस में वार्ता कर रहें हैं।

मोहन - अरे रोहन ये क्या किया ! तुमने छींक दिया, मैं रिश्तों पर कुछ लिखने कि सोच रहा था, तुम भी ना! मैं जब भी कुछ सोच रहा होता हूं और तुम छींक देते हो और मैं सोचना भूल जाता हूं। आखिर मेरी सोच और तेरी छींक का सम्बन्ध क्या है।


रोहन (अखबार पढ़ते पढ़ते )- यार तुम सोचते ही क्यों हो और तुम सोचते क्यों रहते हो, सोचते सोचते कोई निश्चित निष्कर्ष क्यों नहीं निकाल पाते हो।

मोहन-क्या कहूं यार एक लम्बी कहानी है जो तुम नहीं जानते हो, इसलिए ऐसा कहते हो , तुम्हारी अगर मेरी जैसी कहानी होती तो तुम भी सोचते ही रह जाते ।( कुछ क्षण खामोशी के बाद)

रोहन- तो तुम अपनी कहानी मुझसे कब से छिपाने लगे।

मोहन-ऐसी बात नहीं है यार पर वो क्या है कि कभी इतना समय नहीं मिलता कि कुछ कह सकूँ और अगर समय मिलता है तब तुम नहीं मिल पाते ।

रोहन - चलो आज मैं भी व्यस्त नहीं हूं और तुम  भी, तो क्यो ना आज ही कह दो कि कहीं फिर से कोई नया बहाना ना बना लो।

मोहन - ठीक है तो सुनो! रोहन, कहते है कि समय सब जख्मों को भर देता है चाहे वो ज़ख्म शारीरिक हो या मानसिक पर इनसे भी परे होता है वो समय का ज़ख्म जो एक ऐसी अवस्था में मिलता है जिसमें हमारे विचार और हमारी समझ का विकास शुरू होने लगता है।

रोहन - तुम्हारा मतलब किशोरावस्था से है।


मोहन- हां हो सकता है पर वो अवस्था किशोरावस्था ही हो यह जरूरी नहीं है क्योंकि कठिन परिस्थितियां तो हर अवस्था में मनुष्य के साथ है। तुम बचपन से मेरे साथ रहें और तुमसे कुछ छिपा हो ,ऐसा भी नहीं है पर बीच के वो कुछ साल जिसमें तुम और मैं दोस्त नहीं रहे थे और तुम भी पी.एच .डी.करने गये और भुगोल के व्याख्याता बन गये और अब फिर से दोस्त बने और इसी के कारण तो तुम मुझे भी पढ़ाने का यह काम दिला सके वरना मैने ऐसा थोड़ी सोच रखा था कि ऐसा भी हो जायेगा।

रोहन (बीच में ही टोकते हुये)- अब बस भी करों, मैं सब समझ गया तुम क्या कहना चाहते हो, यहीं कि तुम्हें किसी से प्यार हुआ होगा और उसे किसी और से हो गया होगा क्योंकि तभी तो तुम रिश्तों के बारे में सोचते रहते हो।


मोहन- तुम तो बड़ी सोच के धनी हो पर प्यार नहीं हुआ, किसी से मेरी शादी हुई और अब तुम बताओ की तुम्हें कितने वर्ष लगे तब तुम व्याख्याता बन पायें।

रोहन- यहीं कोई लगभग सात से आठ वर्ष, पर इनका तुम्हारी शादी से क्या सम्बन्ध है ।

मोहन- यहीं तो सात साल अर्थात तुमसे दूर होते ही मेरी शादी हो गयी और अब सात साल बाद बिना उससे मुलाकात हुये ही टूट गयी ।

रोहन- बिना मुलाकात हुये ही भला कोई शादी सात साल तक कैसे रह पायी यार यह तो मेरी समझ से परे है।

मोहन- यही तो मैं कहना चाहता हूं कि जब कभी मुलाकात करने की बात आती थी तो पढ़ाई की बात आ जाती थी और जब पढ़ाई लगभग पूरी होने को आई तो उसने कह दिया कि ये लड़का सीधा साधा है और मेरे लायक नहीं है ।


रोहन - ये तो बहुत ही रोमांचक है यार पहले तो तुम आज से बहुत ही बुरे हाल में थे तो पहले ही इस रिश्ते को टूट जाना था।

मोहन- हां यार मैं भी यहीं कहना चाह रहा था ।

रोहन - तो तुम इसी उधेड़बुन में सारे दिन लगे रहते हो । चलो यार जो हुआ सो हुआ, अब पिछली घटनाओं को भूल जाने में ही भलाई है।

मोहन - हां मैं भी भूलना चाहता हूं पर न जाने क्यों भुला नहीं पाता।

रोहन - हां शायद तुम सही हो क्योंकि मैं इन सबसे नहीं गुजरा तो अनुभव नहीं कर सकता पर इतना अवश्य कह सकता हूं, इसमें तुमने शादी को सिर्फ शादी नहीं समझा और जिससे शादी की उससे सच्चा प्यार भी किया था जो आजकल कोई आसानी से कहां समझ पाते है, तेरी आँखो में उदासी बड़ी साफ नजर आती है। और मेरा मानना है कि तुम्हें छोड़ कर वो भी कहीं चैन नहीं पायेंगे क्योंकि जिस प्रकार कि फसल किसान बोते हैं वहीं तो काटते हैं।मोहन- चलो जो भी हो, हमें बहुत देर हो गयी अब चलना चाहिये।

रोहन- रूको, एक कप चाय का और पीते है फिर यहां से निकलते है पर तुम ‌इन विचारों रूपी जूल्मों के कुएँ में डूब रहे हो इनसे तुम्हें निकलना ही होगा ।

इतने में सोहन (जो कि इन दोनों की बातें बाहर बरामदें में ध्यान से सुन रहा था ,जो कि लोगों की आदत में शामिल है )और बोला कि आज कल लडकियां पैसों के पीछे पागल है ,जहां पैसे है वहां रिश्ते है और मै तो यह तक सोचता हूं कि अगर पैसे पेडों पर लगते तो शायद ये लड़कियाँ बन्दरों के भी सेट हो जाती । ऐसा सुनते ही दोनों एक जोरदार ठहाका लगाकर कमरे से बाहर पार्क में टहलने चले जाते है ।


(हांलाकि यह वार्ता एक कहानी ही है और मैं इतना ही कहना चाहता हूं एक बार किसी से रिश्ता जोड़कर बिना किसी अवगुण(जैसे कि शराब पीना ,जुआ खेलना आदि ) के न आने से पहले ना तोड़े। अवगुणों के आने पर भी सुधरने का मौका दे , क्योंकि कोई वस्तु हीं क्यों ना हो टूट आसानी से जाती है पर जुड़ती आसानी से नहीं। और रहिमन ने भी अपने दोहे में धागे के उदाहरण द्वारा यहीं सीख दी है ।



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