Babu Dhakar

Inspirational Others


4.5  

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मैं किसान बनूंगा

मैं किसान बनूंगा

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कल्पना नगर से कुछ दूरी पर एक अनाथालय है। यहां पर चालीस से पचास अनाथ बच्चे न जाने अपनी किस्मत के खेल से जूझ रहे हैं।

इन बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा इसी अनाथालय ने ले रखा है, इस अनाथालय में से अधिकांश बच्चे गांव से है जिनके मां बाप कर्ज के बोझ और मौसम की बार जैसी अनेक वजहों के कारण अपने बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ गए क्योंकि शायद उन्हें यह अटल विश्वास था कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है। उन्होंने भले ही भागवत गीता जैसे ग्रन्थ ना पढ़े हो पर इतना अवश्य जानते थे कि भगवान होते हैं, शायद वे भूल जाते हैं कि हम मां बाप बच्चों के लिए भगवान से भी ज्यादा अधिक महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि उनका भी तो बचपन था, उनके भी तो मां बाप ने न जाने कितने कष्ट सहें हो। पर समय की गति से ऐसी परिस्थितियां आती है जिसमें किसी को भी अपनी गति का ज्ञान नहीं रहता और मन पर निराशा और चिंताओं के बादल इस तरह चारों ओर से घेर कर इस तरह बरसते हैं कि उस बाढ़ में बहना ही होता है, इसे नियति मान कर बह जाते हैं।

वैसे इस अनाथालय ने अनेक बच्चों को अध्यापक, अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर आदि बना कर पूरे देश में नाम अपना नाम दर्ज करा लिया और बता दिया कि भलाई करने के लिए बस किसी को आगे आना होता है, फिर नियति अपने आप इन आने वाली समस्याओं के पर ऐसे कतरती हैं जैसे किसी समय में देवराज इन्द्र ने पर्वतों के पर काटे थे नहीं तो ये ससुरे पर्वत उड़ उड़कर हंगामा कर देते, पर पर्वतों के उड़ने की बात कितनी सही है ये तो भुगोलवेत्ता ही जाने, पर कल्पना नगर जो कि पहले गांव हुआ करता था, तो उसके बीचों बीच भगवान महादेव शिव का मन्दिर कहीं से उड़ कर आया और बाद में इसके चारों ओर लोगों ने अपने आवास बना लिए, और कहते हैं कि इस मन्दिर के पास जो बरगद का वृक्ष है वो भी दिव्य है क्योंकि न जाने कितने सालों से भी जीर्ण अवस्था में नहीं गया ।

इसी मन्दिर पर यहां के विद्यालय के कुछ छात्र जो कि मिड डे मील के घटिया खाने के विरोधी है वे यहां अपना लंच बॉक्स लाते और इस मन्दिर में बने प्रसाद के साथ ग्रहण करते।

विद्यालय तो विद्यालय होता है, यहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ना ही सबका लक्ष्य होता है, चाहे वह अनाथालय का बच्चा हो या किसी अमीर का पर इस मन्दिर में डिजिटल इंडिया होने के बाद भी अनाथालय से आने वाले बच्चे प्रवेश नहीं कर सकते, वैसे कहा तो यह जाता है कि भगवान शिव आदि योगी है उनके लिए छोटे बड़े और काले गोरे सब बराबर होते हैं, पर न जाने कारण कुछ भी हो अनाथालय से आने वाले बच्चे इसमें प्रवेश नहीं कर सकते, इसी तरह का ही मामला तो सबरीमाला मंदिर में हुआ जहां महिलाओं को प्रवेश ना था और महिलाओं ने आन्दोलन करके प्रवेश पाया, इसी तरह आज के किसान आंदोलन कर के न जाने किसमें प्रवेश पाना चाहते हैं, ये तो यह बात हो गयी कि जिसके पास जमीन तो नहीं है पर किसान सम्मान निधि के पैसे चाहिए, तब पुछता है भारत वाले एंकर कहीं पूछेंगे तो भी ऐसे कि जैसे युद्ध करने के लिए ललकार रहे हो।

इस अनाथालय से स्कूल तक की दूरी इतनी अवश्य थी कि एक स्कूल बस अनिवार्य हो, पर इस अनाथालय के संस्थापक यह कह कर स्कूल बस शुरू नहीं करते कि बच्चे अगर पैदल चलकर स्कूल जाये तो इन्हें पेट दर्द, कमर दर्द और सांस से संबंधित बीमारियां नहीं हो पायेगी, आर्थिक तंगी के कारण भी कुछ पैसों की बचत भी करनी जरूरी है।

इसलिए अनाथालय के बच्चे शाॉर्ट कट लेते हुए खेतों के सहारे बने कच्चे राह से स्कूल तक का सफर तय करते, इस रास्ते जाते हुए उन्हें किसी तरह की परेशानी भी नहीं होती, रास्ते में कभी इमली खाते कभी पपीता तो कभी किसी के खेत से गन्ना तोड़ कर लें आते जैसे इन्होंने ही इन सब को पैदा किया हो, पर बच्चे हैं इनमें इतनी समझ कहां कि अपना क्या और पराया क्या, इसी तरह इनका सफर चल रहा है।

इस अनाथालय के बच्चों में मनन नाम का बच्चा सबसे बड़ा है जो एकमात्र दसवीं कक्षा का विद्यार्थी है पर बच्चा इसलिए क्योंकि यह ऋतिक रोशन की कोई मिल गया मूवी के रोहित कि तरह है हालांकि यह मूवी इतनी फेमस ना हुई हो पर इसके अगले पार्ट जो कि क्रिश 2 और क्रिश 3के रूप में प्रस्तुत किए वे काफी फेमस हुए हैं, लेकिन बॉलीवुड मूवी एक्टर सुशांत सिंह कि मौत के बाद तो बॉलीवुड को संदेह की तरह देखा जा रहा और ट्विटर पर तो इस के विरोध में न जाने कितने ट्रेंड चल रहे हैं और बात कहां से कहां तक नशे तक आ जाती है। जो भी हो पर इन बच्चों को इनसे कोई सरोकार नहीं है क्योंकि इनके पास टाइम पास का सबसे बड़ा साधन स्मार्टफोन नहीं है तो ये ट्विटर नाम कि चिड़िया जैसा कुछ नहीं जानते हैं पर हां स्कूल में अध्यापकों के माध्यम से इनको थोड़ी बहुत जानकारी अवश्य हो जाती है जो अधजल गगरी छलकत जाय वाली कहावत को चरितार्थ कर के रह जाती है। पर ये इन बच्चों के लिए अच्छी बात है कि इन्हें पढ़ाई के लिए ज्यादा समय मिल जाता है, इनकी बुद्धि थोड़ी मंद है तो सिर्फ इसलिए कि इन्हें अपने आहार में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व नहीं पाते हैं।

 मनन भी रोहित कि तरह अपनी जबान लड़खड़ाते हुए यानी कि तोतली बोली बोलता है, इसलिए इसे बच्चा सिर्फ कहते ही नहीं बल्कि सभी उसे चिढ़ाते भी रहते हैं।

पर कहते हैं कि किसी में कुछ कमी होती है पर कुछ बातें या सोच जो उन्हें दूसरों से काफी फेमस बना देती है, ऐसा ही मनन के साथ हुआ, मनन पढ़ाई में होशियार तो नहीं है पर इतना अवश्य है कि अनाथालय के बच्चों से सबसे होशियार या यूं कहें कि अंधों में काना राजा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

इसी तरह बीतें दिनों में हर रोज चिढ़ते चिढ़ाते जैसे तैसे वह दसवीं कक्षा में आया है और आज वह अपने विद्यालय के वार्षिकोत्सव में अपने सहपाठियों में करीब गगन और प्रदीप के साथ स्कूल में प्रवेश करता है।

विद्यालय का परिसर फूलों से कम बैलूनों और रंग बिरंगे अनेक चायनीज प्लास्टिक से बने पेपर की कतरनों से सजा हुआ है, सब बच्चे बरामदे के प्रार्थना स्थल पर प्रार्थना करने के बाद प्रधानाध्यापक के आदेश से वहीं पर बैठे रहते हैं, इसके बाद फॉर्च्यून गाड़ी में जिले के शिक्षा मंत्री आते हैं वैसे तो शिक्षा मंत्री ऐसे ही किसी छोटी मोटी स्कूलों में नहीं जाते हैं पर वे इस स्कूल के प्रधानाध्यापक के कारण ही आज शिक्षा मंत्री जो बने हैं तो उनका यहां आना तो बनता ही है ना, आते ही वे आनन फानन में कहते हैं कि आप में से दसवीं कक्षा के छात्र खड़े होकर सामने खुलें में चले जाये,

दसवीं कक्षा के छात्रों में मनन भी है और वह एकमात्र ही अनाथालय का दसवीं कक्षा का छात्र है।

शिक्षा मंत्री जी शायद पहले से ही सोचकर आये हो कि क्या करना है, सारे छात्र अचरज में पड़ जाते हैं कि अब क्या होगा।

शिक्षा मंत्रीजी वहीं ग्राउंड पर रखी कुर्सी पर बैठते हुए छात्र छात्राओं को पंक्ति में बैठने के लिए कहते हैं।

सभी छात्रों के बैठने के बाद शिक्षा मंत्री जी कहते हैं कि प्रिय विद्यार्थियों आज मैं आपको जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण एक सवाल पुछने जा रहा हूं, जिसे मैं पूछूँ वो ही अपने परिचय के साथ इस सवाल का जवाब दें, सवाल यह है कि आप सब को ये बताना है कि बड़े होकर आप क्या बनना चाहते हैं, सबसे अगली पंक्ति के बाद मनन तीसरी पंक्ति के शुरू में बैठा था, पहली पंक्ति के चार छात्रों ने कहा कि वे क्रमश: अध्यापक, डॉक्टर, वकील और पटवारी बनना चाहते हैं।

दूसरी पंक्ति के छात्र भी क्रमश: उनकी ही देखा देखी बताने लगते हैं।

अब मनन को भी इस सवाल का जवाब तो देना ही है, मनन यानी कि उसे अपने इस नाम से इस तरह चिढ़ाते कि मनन बड़े जतन कर लो फिर भी तुम तोतले के तोतले ही रहोगे और उस मूवी का नाम तो दूसरे सभी छात्रों की जुबान पर है ही जिसमें विलन संजय मिश्रा कहते हैं कि तोतला किसको बोलता है, लेकिन मनन ऐसा नहीं कह पाता और मन मसोस कर रह जाता है, मनन की बारी आने से पहले ही शरारती लड़के नये अध्यापक के आने पर तो बोल देते थे कि यह तोतला है, आज किस की हिम्मत जो शिक्षा मंत्री जी को ऐसा कहें, फिर मनन खड़ा होकर तोतली जुबान से अपना नाम मनन बोलता है तो शिक्षा मंत्री सुनते हैं अमन और

पूछतें है कि अमन तुम क्या बनना चाहते हो बड़े होकर, तब जाकर पास बैठे छात्र ने बताया कि श्रीमान जी इसका नाम मनन है, अच्छा मनन !इतना कहकर अपने पास बुलाकर मनन से वहीं सवाल दुबारा पूछते है, तब मनन ने कहा कि सल् मैं किसाल बनूंगा तब सब छात्र थोड़े हंसकर मंत्री जी के डर के कारण चुप हो जाते हैं, मनन के पास होने के कारण मंत्री जी समझ जाते हैं और कहते हैं अच्छा तुम किसान बनना चाहते हो पर क्यों?

यहां यह महत्वपूर्ण है कि मंत्री जी ने अन्य छात्रों से यह प्रश्न नहीं पुछा क्यों?

क्योंकि अन्य छात्रों के जवाब सामान्य थे और आज सबका उद्देश्य सरकारी नौकरी प्राप्त करना ही है, मिल जाए तो ठीक वरना बेरोज़गारी का गीत गाते रहते हैं।

जवाब में मनन अपने पास के कलम और कागज पर जो लिखकर मंत्री जी को देता है तब उसे मंत्री जी कुछ देर में समझने के बाद सब छात्रों से अपनी भाषा में कहते हैं कि मनन ये कह रहा है कि यह एक किसान इसलिए बनना चाहता है कि आप लोग इसे चिढ़ाते रहते हो कि तुम नौकरी नहीं लग सकते और तुम तोतले हो इसलिए अगर परीक्षा में पास भी हो जाएं तो भी इंटरव्यू में पास नहीं हो पाओगो और यह ये भी कहना चाहता है कि यह जब अन्य किसानों को खेतों में काम करते हुए देखता है तो इसके मन में ऐसा काम करने की तीव्र इच्छा पैदा होती है।

तब मंत्री जी ने कहा कि आप सब इस पर हंसोगे इसीलिए इसने कागज पर लिखकर अपनी बात कही , इसका यह भी कहना है कि आज कोई किसान नहीं बल्कि किसान नेता अवश्य बनना चाहते हैं, इस तरह इसकी ऐसी सोच इसके एक समझदार छात्र होने की पुष्टि करती है और इसका किसान बनना एक तरह से इसकी सकारात्मक सोच का परिणाम है कि यह किसानों को उस हेय दृष्टि से नहीं देखता जैसे कि आज देखा जाता है।

तब सभी छात्र मनन के लिए तालियां बजाने लगते हैं और अंत में शिक्षा मंत्री जी कहते हैं कि इसकी सारी पढ़ाई मैं पुरी करवाऊंगा और इसी के मुताबिक इसे एग्रीकल्चर कॉलेज में प्रवेश के योग्य बनाऊंगा ताकि बाद में यह अवश्य ही ग्रामीण किसानों की मदद के लिए नये नये तरीकों की खोज कर सकेगा। अक्सर ऐसा होता है कि जो किसी क्षेत्र विशेष में काबिल हो पर उसे किसी का सपोर्ट ना होने से वे ऐसे अवसरों से वंचित रह जाते हैं, मैं मनन का पूरा सपोर्ट करता हूं (एक बार फिर तालियां बज उठी)

और कहानी का अंत करते हुए

इसी आशा के साथ मैं

अपनी बात कहता हूं कि ऐसे अनेक मनन "कोई मिल गया मूवी" के रोहित कि तरह कृषि क्षेत्र में भी कुछ ऐसा कर जायें, जो किसानों कि किस्मत चमका सकें।



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