यादों का साया
यादों का साया
काश ये यादाश्त खो जाती कहीं,
जैसे रेत पर लिखी बात बह जाती कहीं,
न रहती आँखों में नमी सी हरपल,
न चुभती तेरी यादों की हर हलचल।
तेरी याद फिर ना सताती,
ना तन्हा रातें मुझसे बातें करती,
ना दिल को तेरा ख़्याल डुबोता,
हर साँस में तेरा नाम ना होता।
उसे ना पाने का ग़म बार-बार ना उठता,
ना दिल किसी मोड़ पर ठहर कर रोता,
ना ख़्वाबों में तेरा चेहरा आता,
ना हर सुबह अधूरी सी लगती जाती।
ज़िंदगी शायद कुछ और हो जाती,
थोड़ी ख़ामोश, थोड़ी बेगानी सी,
मगर दर्द से थोड़ी आज़ाद भी होती,
हर लम्हा तेरी तलाश में ना रोती।
पर शायद... हाँ शायद...
याद ही तो बचा लेती है इंसान को,
उसने जो खोया, उसे छूने की आस को,
जो बीत गया, उसे फिर जीने के एहसास को।
तो चलो, इन यादों को सीने से लगाते हैं,
हर आँसू में उसकी मुस्कान सजाते हैं,
क्योंकि कभी-कभी, बस एक याद ही काफी होती है,
इंसान को... इंसान बनाए रखने के लिए।

