"मैं टूटी, मगर रुकी नहीं"
"मैं टूटी, मगर रुकी नहीं"
मैने ख़ुद को तेरे लिए तबाह कर दिया,
हर ख़ुशी, हर सपना तेरे नाम किया।
पर मिला क्या? — बस अकेलापन, दर्द,
ज़िंदगी की रौशनी भी जैसे हो गई ज़र्द।
अब झूठी मुस्कान पहननी पड़ती है रोज़,
हर आहट पे दिल पूछे — क्या कोई है अब भी ख़ास?
सपनों की चादर फटी सी लगती है,
और रातें — वो तो बस सिसकियों में कटती है।
मगर फिर याद आता है मुझको माँ-पापा का प्यार,
उनकी उम्मीदों का वो प्यारा संसार।
जिन्होंने बिना शर्त मुझे दुआओं से सींचा,
हर आँसू, हर दर्द को चुपचाप खींचा।
तो हाँ...
अब चाहे आँधियाँ आएँ या राहें उलझ जाएँ,
मैं नहीं रुकूँगी, खुद को फिर से उठाऊँगी।
क्योंकि…
मैं जीऊँगी उनके लिए, जो मेरा गर्व हैं,
मैं बनूँगी वो किरण जो खुद भी चमके और दे सके दूसरों को धर्म।
ज़िंदगी को अब बेहतर बनाना ही मेरा मकसद होगा,
हर ठोकर, हर ग़म अब मेरी ताक़त होगा।
I will… I can…
अब हार नहीं मानूँगी,
खुद को फिर से जीना सिखाऊँगी। 🌸

