व्यावहारिकता
व्यावहारिकता
नाचते रहें
अपने ही
तालों पर
अहंकार के पर्वतों
को हम क्यूँ ना
छू लें !
लोगों को पहचानने
में आनाकानी
करते रहें,
समाज के कर्तव्यों से
मुँह सदा मोड़ते रहें,
झूठा स्वांग
व्यावहारिकता की
झाँकियाँ लोगों को
दिखाते रहें,
व्यंग-वाण से
लोगों को सदा ही
आहत हम करते हैं !
औरों की बात छोड़
अपनो से दूर
रहने की प्रवृतियाँ
कितने दिनों तक
काम आएंगी ?
सुखमय जीवन
ध्वस्त हो जाएंगे
हम बिखर जाएंगे !
कब तक...आखिर... कब तक
हम यूँ ही संकीर्णता के
मार्ग पर चलते रहेंगे ?
हम यूँ ही अपनों से
दूर होते जाएंगे !
पतझड़ के पत्तों
की तरह हम बिखर जाएंगे !
समर्पण और परमार्थ
की भावना
को लेके उतारना होगा
उत्थान मिल-जुलकर
सदा लोगों का
हमें करना पड़ेगा !
दुःख दर्द लोगों का
हम सदा ही बाँट लेंगे
इतिहास के पन्नों में
हम जुड़ते रहेंगे !
