वक्त
वक्त
रह गईं धरी की धरी यहीं पर सारी रियासतें ,
कोई ले ना जा पाया संग अपने धरोहर विरासतें,
टिक टिक करती सुइयों पर फिसलते देखा है ,
हमने भी वक्त को हाथों से फिसलते देखा है !
हाथों से फिसलता जाता है बेवफा रेत की तरह,
झटक देता है अगले ही पल हाथ अन्जान की तरह,
मुट्ठी में कैद करने की सारी कोशिशें बेकार जाती है,
बाद इसके राह तकते कोरों पर नमी जम जाती है..!
संजो कर अंजुरी में जो मंजिलों की ओर चलते हैं ,
साथ मिला कदम ताल जो वक्त के साथ ढ़लते हैं,
मिलती है कामयाबी और सम्मान भरपूर पाते हैं ,
कद्र नहीं करते वो जीवन में खाली हाथ रह जाते हैं..!
बेशकीमती जब से समझ पायी हूं कीमत तेरी,
बड़ी करीने से सजा रखी है हर पल जिंदगी मेरी,
बॉंध कर गिरह से अपनी हथेलियों में सजा रखा है,
अब नहीं कहती कि वक्त को हाथों से फिसलते देखा है..!
ऐ वक्त! तू ही सच्चा दोस्त सफर का हमसफर है मेरा,
हर वक्त सही राह दिखाई जब जब मुश्किलों नें है घेरा,
पाया है मानव जीवन बड़े भाग से हाथ बढ़ा रखा है,
अब नहीं कहती कि वक्त को हाथों से फिसलते देखा है..!
