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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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वक्त आज का

वक्त आज का

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आज बीते वक़्त की,

खिड़की को खोला।

जो गए दिन बीत,

उनकी ओर देखा ।


कुछ पलों को देख मन, 

कितना व्यथित था।

देखकर संघर्ष को,

कितना थकित था।


कुछ पलों की याद से,

उमड़े थे बादल।

आँख की कोरों से,

बह निकला था काजल।


कुछ पलों ने,

मेरे मन को गुदगुदाया।

रोक लूँ बस उन पलों को,

भाव आया।


वक़्त का पहिया,

निरंतर घूमता है।

सुख और दुःख का,

समय कब ठहरता है।


जो अभी क्षण जी रहे,

वो कब रहेगा?

वक़्त की नदिया में,

वो भी तो बहेगा।


छोड़ कल की याद,

कल की कल्पनायें।

सुखद सी अनुभूति से,

ये पल सजाएं।


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