विरह
विरह
नवल उमंग नित करत जिरह
कोकिल कूके बैठी बगिया,
कूक के साथ एक हूक उठत,
पिय बिन तड़पे छतिया।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
पल्लव पुलकित पर्णी डलियाँ
प्रिय न लगे मोहे शंकुत गितिया
सकल उमंग अतृप्त ओहि भाँति
जेहि भाँति अलि बिनु कलियाँ
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ
जात बढ़त ज्यों दिन बीतत
पिय विरह तप मोरे बदन सींचत
दरस तोहे जो मैं पा जाऊँ
उर बीच ठंड बहुत ही मिलत।
मिलत नही तोरी स्नेहिल छहियाँ।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
जैसे ज्येठ दुपहरी लहर चले
वैसे ही नगिनिया मनवा चले,
न जलत हो ओहि भांति भानु
जेहि भांति हमरो जियरा जले।
देहियाँ सुखाए विरह अगिनियाँ।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
नभ ज्यों ज्यों कारे बदरा चढ़े
सावन भादो पिया प्यास बढ़े,
एक तो चमक फीकी अँखियन की
दूजे चिढ़ाए चमकत बिजुरिया।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
उतरत वृष्टि सजन पर
तापो विरह न उतरत,
कर दो दृष्टि अब सजन
बैरन विरह न बिखरत।
वृष्टि विरह बन आड़े आवे
देख न पावे हरियाली अँखिया।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
आयो हेमन्त बसन्त मेरो छिनौ
है उम्मीद मन बस इतना कीजौ,
जिय ललचात पिय-सुरभि पान
ज्यों ज्यों घटत विरह अग्नि
त्यों त्यों उर प्रीत कम्पित कीजौ।
यक-पिय बिन कटत न रतिया।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
जाइ डंसे तोहे मोहे आहि
बीतत जात देखो माघहि माहि,
अबहुँ तक न कोई सन्देशो आयो,
थकि जावें नित नैन निहारत राहि।
ठंड पड़ गई तुम्हरी धरीतिया।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
कट गईं देख अब तो फागुन आयो
पर पिया मोहे कोई रंग न भायो,
अब कौन श्याम मोहे रंग लगायो,
उड़ गईं दूजौ देश लगत है,
सौत हवा संग जो सन्देश पठायो।
सुईयां संग सूनी सगरी अबिरिया।
कैसे कहूँ सखि विरह की बतियाँ।
