विनय
विनय
हे! मात दया करना मुझ पर ,रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।
यह मन अनुराग से भरा रहे ,हे मात तुम्हारे चरणों में।।
यह मन बेपरवाह हो जाता है, बिन ज्ञान तुम्हारे चरणों में।
मेरी तो औकात ही क्या, देवता भी नतमस्तक तुम्हारे चरणों में।।
मैं तो लिपटा फिरता इस माया में ,हो अनजान तुम्हारे चरणों में।
स्वर्ग- नरक की चाह नहीं, बस चाह रहे तुम्हारे चरणों में ।।
विषय -वासना के चक्कर में, रहा ध्यान ना तुम्हारे चरणों में।
अब तप्त हृदय भी व्याकुल है ,जो मिटे तुम्हारे चरणों में।।
कण-कण मे हो व्याप्त तुम्हीं, सब मग्न हो रहे तुम्हारे चरणों में।
मन की पीड़ा को दूर करो ,जलपान कर, तुम्हारे चरणों में।।
कलिमल हरना और साहस भरना ,सफल सभी तुम्हारे चरणों में।
मन मस्त हुआ "नीरज" गाय,जयगान, तुम्हारे चरणों में।।
