वीर तुम बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
चाहे हो धूप या हो छाया, मुश्किलों को मिटाते रहो,
मिटा सके जो तुम्हारा निशान , ऐसी विपदा को हराते रहो,
मंज़िल हो दूर या हो समीप, कदम आगे बढ़ाते रहो ।
मिल जाएगी मंज़िल कभी ना कभी , सपनों का पीछा करते चलो,
जो पीछे उनके ना चल सको तो नए ख्वाब बुनते चलो,
मंज़िल हो दूर या हो समीप , ख्वाबों का कारवां सजाते रहो
खिलौनों की भांति दिल भी टूट जाते हैं लोगों के,
जतन करो कि दुखी जाने-अंजाने में तुमसे ना कोई होने पाये,
गम आए चाहे ,चाहे खुशियों दूर भाग जाएँ ,मुस्कान चेहरे की ना खो जाये,
इसलिए मंज़िल हो दूर या हो समीप , विपदाओं को हराते रहो ।
कदम बढ़ाने को बस एक मुसाफिर और दृण निश्चय काफी है ,
इस एक उम्मीद में ,उम्मीदों को ना कभी बुझने दो,
आशा की ज्योत हर दम प्रज्ज्वलित हृदय में रखो,
मंज़िल हो दूर या हो समीप, हार को हर पल हराते रहो ।
