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अनजान रसिक

Inspirational

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अनजान रसिक

Inspirational

वीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो

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चाहे हो धूप या हो छाया, मुश्किलों को मिटाते रहो,

मिटा सके जो तुम्हारा निशान , ऐसी विपदा को हराते रहो,

मंज़िल हो दूर या हो समीप, कदम आगे बढ़ाते रहो ।


मिल जाएगी मंज़िल कभी ना कभी , सपनों का पीछा करते चलो,

जो पीछे उनके ना चल सको तो नए ख्वाब बुनते चलो,

मंज़िल हो दूर या हो समीप , ख्वाबों का कारवां सजाते रहो

खिलौनों की भांति दिल भी टूट जाते हैं लोगों के,


जतन करो कि दुखी जाने-अंजाने में तुमसे ना कोई होने पाये,

गम आए चाहे ,चाहे खुशियों दूर भाग जाएँ ,मुस्कान चेहरे की ना खो जाये,

इसलिए मंज़िल हो दूर या हो समीप , विपदाओं को हराते रहो ।


कदम बढ़ाने को बस एक मुसाफिर और दृण निश्चय काफी है ,

इस एक उम्मीद में ,उम्मीदों को ना कभी बुझने दो,

आशा की ज्योत हर दम प्रज्ज्वलित हृदय में रखो,

मंज़िल हो दूर या हो समीप, हार को हर पल हराते रहो । 



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