वह मानिनी स्त्री है
वह मानिनी स्त्री है
वह मानिनी स्त्री है ,उसमें शक्ति अपार है,
आज नारी पर टिका हुआ सारा संसार है !
चलती है मानिनी स्त्री सदा एक शूल पर,
स्त्री के रक्त से शूल भी बन जाते हैं फूल !
लोग कितना भी बिछाएं उसके पथ में कांटे,
पर...स्त्री तो उसे फूल बना के ही सब में बांटें !
स्त्री में बहुत ममता और सहनशीलता होती है,
क्योंकि, स्त्री की नज़र में एक समता होती है !
दर्द सहना एक स्त्री से बढ़कर कौन जानती है,
स्त्री चुप रहकर परिवार को जोड़कर रखती है !
कभी तो पति के लिए तो कभी बच्चों के लिए,
कभी तो समाज के लिए तो कभी धर्म के लिए !
स्त्री ने सहा आग में जलना, बाजार में बिकना,
स्त्री ने सीखा जीवन की चुनौती स्वीकार करना !
अब स्त्री न किसी से डरती है और न रुकनेवाली है,
आगे के दिनों में स्त्री पूरी दुनिया में छा जानेवाली है !
स्त्री को कुछ देना है तो उसको सिर्फ आशीर्वाद दीजिए,
उसके रास्ते में अब कोई पत्थर मत अटकाया कीजिये !
