ऊंचाई
ऊंचाई
है बहुत ख्वाहिशों की आजमाइश
ऊंचाई और बुलंदियों की अथाह को
टिकने या मात्र छूने की है गुंजाइश
समक्ष जो है खड़ी विपदा कठिनाइयों की चट्टानें
जूझता रहा मैं बन उठती सागरों की लहरें
कोशिशों को कर नाकाम वह पीछे ढकेलता रहा
हिम्मत- ए-जज्बा के साथ बार-बार वापस मैंआता रहा
समय के थपेड़े उसे कमजोर करते रहे
मेरी कोशिशों के रंग के असर उसे दिखते रहे
इधर की चोट से बिखर रहा था वह जरा मद्धम
धीरे-धीरे कतरा- कतरा- ए-जर्रा
देख मंजिल साधा निशाना चलता रहा
कुदरत- ए- करिश्मा रास्ता अपना बनता रहा
अब ऊंँचाइयों की बुलंदियों को छूने की नहीं
टिकने की है मात्र अब सुकून- ए-फरमाइश।
