STORYMIRROR

Khalid MOHAMMED

Classics

2  

Khalid MOHAMMED

Classics

उलझन

उलझन

1 min
236

ज़िन्दगी यूँ ही

उलझ गयी है

सुलझाते सुलझाते,


ज़िन्दगी यूँ ही

उलझ गयी है

सुलझाते सुलझाते,


कि पता नहीं चल रहा

कौन ज़ख्म दे रहा है

और कौन मरहम लगा रहा है ?


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics