STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

4  

Surendra kumar singh

Abstract

तुम्हारी आवाज में

तुम्हारी आवाज में

1 min
626

तुम्हारे होने के किस्से

से तो रौशन है

पृथ्वी पर मनुष्य की सभ्यता

और उसकी सम्प्रभुता

प्रेम, त्याग, समर्पण

जीवन की ऊर्जा का सदुपयोग।


सदियों से अब तक

हाँ तुम आज भी मेरे लिये

एक आवाज हो भारत

एक उम्मीद हो

एक भविष्य हो


इस बेचैन और जख्मी दुनिया की

एक सरल सी दवा

जैसे निर्मित हो रहा अतीत

वर्तमान में

आधुनिकता ढल रही है


अतीत में लग रहा है

इससे आधुनिक कुछ मुमकिन नहीं है

सचमुच भविष्य सिमट आया है

वर्तमान में तुम्हारी आवाज में।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract