तुम स्त्री हो
तुम स्त्री हो
हमें झेलने होंगे
उनकी मनमानियों के दंश
हमें देखने होंगे
कुचले आत्मसम्मान के अंश
हमें छुपाने होंगे
रिसते हुये जख्म
हमें मानने होंगे
उनके सारे हुक्म
वे कहते हैं
वे हमें रोटी देते हैं
वे कहते हैं
वे हमें घर में रखते हैं
वे कहते हैं
वे हमें पूर्ण बनाते हैं
सुनो लड़कियों!
गर मन की सुनना चाहती हो
स्वप्नों को बुनना चाहती हो
पहचान बनाना चाहती हो
तुम खिलखिलाना चाहती हो
गगन छूने का है अरमान तुम्हें
बचाना है आत्मसम्मान तुम्हें
तो जाग जाओ
समय रहते जाग जाओ
छोड़ो यूं ही सजना संवरना
मोम की गुड़िया बनना
इश्क - मुहब्बत के फसाने
वही पुराने तराने
तुम पढ़ो खूब पढ़ो
मन लगाकर पढ़ो
बना तो लेती हो
रोटी को रोटी
और घर को घर
अब कमा भी लो
अपनी रोटी
अब बना भी लो
अपना घर
और रही बात पूर्णता की
तो याद रखो
तुम स्त्री हो
खुद में ही सम्पूर्ण हों।
