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Ashish Anand Arya

Abstract

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Ashish Anand Arya

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तुम संग बिस्कुट वाली शाम

तुम संग बिस्कुट वाली शाम

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पूरे दिन की सिरदर्दी बाद

चाय और बिस्कुट की शाम!

संग तुम्हारे बैठ बतियातीं

मुझसे मेरी ख्वाहिशें तमाम!


उँगलियों की अठखेलियों से

माथे की तह में पलता सुकून,

दिनभर कैसे चलीं दूरियाँ

सोचता मैं तुमसे ज्यादा हैराँ!


खनखनाती खुश कलाइयों के

प्यार की कैद में यूँ महफूज़... 

होठों पर गुनगुनी सी चुस्की

आँखों में खूब ढेर ईत्मीनान!


रूपये के रिवाज से मन गुस्सा

ये रोज-रोज का कैसा काम?

ज़रा मुहब्बत में ढाल दो साँसें

एक मुस्कराहट में सब ईनाम!


सुबह रौशनी के रंग संग उम्दा

शाम चंदा के ओढ़ लिबास

खनखन चूड़ियाँ घोलें यूँ ख़ुशी

प्याली के आशिक़ रहीम औ राम!


ज़िन्दगी भर ये तमाम तकलीफें

सारे तंगहाल बंदोबस्त दरम्यान...

तरतीबों की पर बड़ी माहिर म्यान

तुम, चाय और बिस्कुट की शाम!



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