तुम बहती रहना ... !
तुम बहती रहना ... !
पग-पग पर सभ्यता संस्कृति पुष्पित करती रहना,
गोमती मईया, तुम बहती रहना।।
ऋषि वशिष्ट की दुहिता, तेरा नमन करें हम,
तन-मन-धन के पाप-शाप को भी धो लें हम।
धन्य है गोमत ताल जहां से हुआ है तेरा उदगम,
आदि गंग तेरी धारा से पुलकित कोटि-कोटि है
जन-मन।।
ममता और निजता का ऐसा मान बनाए रखना,
गोमती मईया ...।
भूजल स्रोतों से जल लेकर तुम हो आगे बढ़ती,
पग पग पर प्यासी धरती का तुम हो प्यास बुझाती।
अवध में अदब-इबादत का तुम सुमधुर गीत सुनाती,
दुनिया में तहजीब का भी तो परचम तुम लहराती।।
कोटि कोटि युग तक हे मईया अस्तित्व बनाए रखना,
गोमती मईया ...।
मनु-शतरूपा महायज्ञ की तुम तो साक्षी हो,
धर्म ध्वजा फहराने की भी तुम अभिलाषी हो।
ऋषि दधीचि के अस्थि दान का तुम ही गौरव हो,
मर्यादा के चरण कमल को धन्य कर चुकी हो।।
स्नान-दान-कल्याण की सहचर सदा ही बनती रहना।
गोमती मईया, तुम बहती रहना।।
