ट्रेन में लूट की वारदात की एक रात
ट्रेन में लूट की वारदात की एक रात
ट्रेन ने स्टेशन छोड़ा
धीरे धीरे उसने रफ्तार पकड़ ली थी
शाम का सूरज ढल गया था
अंधकार अपनी कालिख को
आसमान में यहां वहां
पोत रहा था
मैं खिड़की से बाहर झांकती
रेलगाड़ी के सफर का आनंद ले रही थी
आंखों के सामने आते दृश्य
कैसे गाड़ी की रफ्तार के
साथ साथ ही बदलते जा रहे थे
अगला स्टेशन अभी काफी
दूर था
चांद तो आसमान में कहीं
दिख ही नहीं रहा था
बादलों के पीछे न जाने कहां
छिप गया था
चांद की रोशनी के अभाव में
बाहर चारों और पसरा
अंधेरा किसी नागिन सा ही डस
रहा था
ट्रेन एक घने जंगल से
होकर गुजर रही थी
कुछ दूरी पर ही पहाड़ियों की भी
थोड़ी बहुत झलक
आंखों पर बहुत जोर देने पर दिखाई
पड़ जाती थी
खिड़की से हवा के थपेड़े
चेहरे के गालों और मेरे बालों
को ऐसे हिला रहे थे कि
जैसे किसी तेज धार के
चाकू से मुझे काट ही डालेंगे
मैंने सोचा कि चलो
अब सोने से पहले
थोड़ा लेट लेते हैं
खिड़की को लगभग बंद सा ही
कर देते हैं और
आधा अधूरा सा बिस्तर
लगाकर सोने की तैयारी करते हैं
प्यास लग रही थी तो
दो घूंट पानी पीने की
तीव्र इच्छा मन में जगी
पानी हलक से नीचे नहीं उतरा था
कि एकाएक हमारी बोगी में
कुछ चीख पुकार की आवाजें
सुनाई पड़ने लगी
पानी छोड़ दौड़कर देखा तो
आत्मा कांप गई
यह समझते देर नहीं लगी कि
हम यात्रियों पर
कुछ गुंडों ने
गिनती में शायद चार ही
लग रहे थे ने जानलेवा आक्रमण
बोल दिया है
उनके पास पिस्टल और
कुछ धारदार हथियार भी दिखाई
पड़ रहे थे
यह बात तो साफ तौर पर
समझ आ रही थी कि
उनका इरादा लूट का था
लूट में असफल होने पर
हत्या का अंदेशा भी था
मदद के लिए किसे पुकारे
यह इस समय किसी को
न समझ आ रहा था
न ही कोई अपनी जगह से
हिल पा रहा था और
न कुछ करने की ही स्थिति में
था
मेरी आंखों के सामने
एक महिला के तो अपना
सोने का कंगन देने से इंकार
करने पर उन्होंने उसकी
बेरहमी से हत्या कर दी
इतनी चीख पुकार मची हुई
थी तो कुछ को तो उन्होंने
कत्ल भी किया ही था
मेरी तो अपनी जान पर बन
आई थी
सामने मौत खड़ी थी
जिंदगी का होना या
न होना
अब मेरे हाथ में नहीं था
यह तो अब उन चार
मारने वालों का निर्णय था
कि वह मुझे मारते हैं या
छोड़ देते हैं
ईश्वर के हाथ में था कि
वह कोई करिश्मा करें
और जो यात्री अभी शेष हैं
किसी भी तरह उनकी जान
बचाये
ट्रेन की रफ्तार कुछ धीमी
पड़ रही थी
जितनी लूटपाट वह करना चाहते
थे
वह चार गुंडे वह कर चुके थे
जिन्हें मारना चाहते थे
उन्हें मार चुके थे
जो होना था वह हो चुका था
उस पर किसी का कोई नियंत्रण
नहीं था लेकिन वह चारों
ट्रेन से एक एक करके नीचे कूद गये
और लुटे हुए सामान के साथ ही
घने जंगल के अंधकार में कहीं
खो गये लेकिन
जो अंधकार वह उन मृतकों और
उनके परिजनों के जीवन में
भर गये
उन्हें कौन सा वह रोशन सवेरा
होगा जो कभी मिटा
पायेगा
ऐसा तो कभी नहीं हो
पायेगा
जो जिंदा रह गये
और इस भयावह मंजर के
साक्षी बने
उन्हें भी तो यह हादसा
और उनके जीवन का
यह काला दिन
अंधेरी काली लूट की वारदात की एक
रात का कभी जीवन भर
नहीं भूलेगा।
