ट्रांसजेंडर
ट्रांसजेंडर
हीरे-मोती, माणिक पहन मैं
रोज यहाँ-वहाँ मंडराता
न मैं स्त्री न पुरुष हूँ
अभागा किन्नर हूँ कहलाता।।
मात-पिता न भाई-बंधु
न कोई रिश्तेदार मेरा कहलाता
घर-परिवार में जगह न मेरी
न समाज ही मुझे अपनाता।।
शिक्षा-सुरक्षा से वंचित रहता
न सम्मान जहां में पाता
अवसादों से घिरा हुआ मैं
जीवन अलगाव-एकाकीपन का जीता।।
मेरी दर्द-पीड़ा की किस को पड़ी है
चाहे किसी पर जान लुटाता
एहसास की मेरे कदर न जाने
चाहे दिल चीर के मैं दिखलाता।।
शुभ मुहूर्त में खुशी मनाता
आशीर्वाद भी देकर जाता
कोई खुश न होता मुझे देखकर
क्या इंसान नहीं मैं होता।।
तड़प-तड़पकर काटता हर पल
पर किसी को कुछ न कहता
न जीने-मरने की मेरी फिक्र किसी को
किन्नर होने का मोल चुकाता।।
ट्रांसजेंडर के अधिकार से वंचित
मूल अधिकार भी मैं न पाता
स्वीकार न करता मुझको कोई भी
नजर हर जन मुझसे चुराता।।
सार्वजनिक शौचालय तक न मेरी पहुँच है
वहाँ भी लज्जित होता
वोट देने का अधिकार है मुझको
लेकिन वोट न देने पाता।।
प्रतिनिधि अपना चुन न सकता
न कोई मेरे हक में आवाज उठाता
रोजगार लाइसेंस प्राप्त न होता
वहाँ भी अछूत हूँ कहलाता।।
जीवनयापन करूँ मैं कैसे
न नौकरी-व्यापार की सुविधा पाता
नाच-गाकर मैं भीख न मांगूँ तो
सेक्स वर्कर काम ही बचता।।
समुदाय-संपत्ति अधिकार से वंचित हूँ मैं
बहिष्कृत-उपेक्षित समाज से रहता
कलंक समझते समाज के लोग मुझे
न किसी से मेरा नाता।।
सामाजिक और सांस्कृतिक में न मेरी भागीदारी
समानता-संवैधानिक संरक्षण से वंचित रहता
कानून की नजर में सब समान है
पर ये वास्तविकता में कभी न दिखता।।
उत्पीड़न, दुर्व्यवहार और निजी भेदभाव का सामना करता
जबकि मानवाधिकार का है ये मुद्दा
विधेयक भी यहाँ पास हो जाते
न समाज अमल में इसको लाता।।
सख्त दंड का विधान है लेकिन
दंड न कोई भी पाता
पुनर्वास, स्व-रोजगार और स्वास्थ्य सेवा का अधिकार प्राप्त है
पर उसका लाभ न किसी को मिलता।।
मोह-माया न इच्छा-तमन्ना
इंतज़ार में मौत के रहता
अंत समय में भी गाली खाता
घोर बेइज्जती सहता।।
बीपीएल श्रेणी में आते है हम
वेलफेयर बोर्ड का गठन भी होता
स्त्री-पुरुष भारत के लोग कहलाते
क्या किन्नर भी हिन्दुस्तानी कहलाता?
