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Sandeep Murarka

Romance

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Sandeep Murarka

Romance

ठकुरानी

ठकुरानी

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विचित्र ये दुनिया विचित्र है ये संसार

अप्रतिम सौंदर्य की मूर्ति थे श्रीकृष्ण

स्वयं भगवान श्री विष्णु के अवतार

बावजूद करना पड़ा प्रभु को अपहरण


करने रुक्मणि के साथ विवाह संस्कार

सत्यभामा सत्या कालिंदी और मित्रविंदा 

बनी पटरानी लक्ष्मणा जाम्बवन्ती औ' भद्रा

भय मुक्त करने पृथ्वी को किया नरकासुर का संहार  


मुक्त हुई उसके बंधन से राजकुमारियाँ सोलह हजार

देकर स्थान पत्नी का किया केशव ने सबका उद्धार

अलग अलग महल हर रानी का अलग अलग ठाट

गोविंद की लीलाओं से द्वारका नगरी थी बाग बाग


खुश थी सभी रानियाँ जनता की भी खुशियाँ अपार

रोज़ मनाते होली दिवाली राजा प्रजा और रिश्तेदार

द्वारका में मनता था उत्सव रोज़ संगीत साज शृंगार

इधर रोती ब्रज की गोपियाँ लूट गया था जिनका प्यार


इधर गोपियाँ उधर रानियां एक सौ आठ सोलह हजार

फ़िर भी अतृप्त मन टूटा दिल ह्रदय में शून्य आकार

कौन थी वो ? छिन लिया जिसने गोविंद का चैन

फीकी फीकी रहती जिसके बिना गिरधर की रैन


किया नहीं विवाह उससे दिया नहीँ अपना नाम

पर हर मंदिर में आज उसी के साथ दिखते श्याम

अधूरी है उसके बिना गिरधर मुरारी की हर मूरत

सूना है हर मंदिर जहाँ न हो उस प्रेयसी की सूरत


अजी ! ठकुरानी थी वो बरसाने की राधा उसका नाम

दुनिया दीवानी घनश्याम की राधा के दीवाने श्याम।


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