Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Pawanesh Thakurathi

Romance


4.3  

Pawanesh Thakurathi

Romance


त्रिज्या से व्यास बन गई हूँ

त्रिज्या से व्यास बन गई हूँ

1 min 415 1 min 415

हरी-भरी धरती थी

अब तो नीला आकाश बन गई हूँ

तेरे प्रेम में ओ पगले ! 

त्रिज्या से मैं व्यास बन गई हूँ। 


तू क्या जाने

मेरे जीवनवृत्त की

एकमात्र परिधि तू ही है

अब बावली होकर 

तेरे दिल की

आनी-जानी सांस बन गई हूँ


तेरे प्रेम में ओ पगले ! 

त्रिज्या से मैं व्यास बन गई हूँ। 


Rate this content
Log in

More hindi poem from Pawanesh Thakurathi

Similar hindi poem from Romance