तारे
तारे
निशा की काली चादर पर,
चुपके हुए बड़ी धवल चमक पाते हैं तारे;
जीवन मरण के चक्र में अटके,
बादलों की अरघनी में अटक जाते हैं तारे;
भीड़ में गुम हो जाते हैं,
बिना आवाज़ ही खनक जाते हैं तारे;
बदलते ताप के कुचक्र में,
टूटकर ज़मीन पर आ धमकते हैं तारे ;
बटोरते रहते किरणें चमकने को,
हर पल जीने की आस में टिमटिमाते हैं तारे;
रोशन हो उठता घनी रात में,
अम्बर पर मोती से नज़र आते हैं तारे।
