STORYMIRROR

Anita Sharma

Abstract

4  

Anita Sharma

Abstract

तारे

तारे

1 min
449

निशा की काली चादर पर,

चुपके हुए बड़ी धवल चमक पाते हैं तारे;


जीवन मरण के चक्र में अटके,

बादलों की अरघनी में अटक जाते हैं तारे;


भीड़ में गुम हो जाते हैं,

बिना आवाज़ ही खनक जाते हैं तारे;


बदलते ताप के कुचक्र में,

टूटकर ज़मीन पर आ धमकते हैं तारे ;


बटोरते रहते किरणें चमकने को,

हर पल जीने की आस में टिमटिमाते हैं तारे;


रोशन हो उठता घनी रात में,

अम्बर पर मोती से नज़र आते हैं तारे।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract