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मिली साहा

Abstract Inspirational

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मिली साहा

Abstract Inspirational

स्वतंत्रता है सबको प्यारी

स्वतंत्रता है सबको प्यारी

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शायद ही कोई ऐसा होगा, जो परतंत्र रहना चाहता है,

स्वतंत्रता एक ऐसा एहसास, मन उमंग से भर देता है,

छीन लिया जाता जब किसी से, उसकी स्वतंत्रता को,

तो जीवन का वास्तविक सुख ही समाप्त हो जाता है।


यह कहानी है ऐसे ही एक मूक प्राणी के स्वतंत्रता की,

जिसके पांँव में पहना दी गई थी बेड़ियांँ परतंत्रता की,

छीना आसमां उसका किया उसे उसकी दुनिया से दूर,

बाकी का जीवन कैद में बिताने के लिए किया मजबूर,


उड़ता था वो पंछी खुले आसमान में, पंख पसार कर,

दाने पानी की तलाश में घूमा करता था वो इधर-उधर,

जहांँ दिख जाता दाना वहीं पर उतर जाया करता था,

अपनी भूख मिटाकर वापस घोंसले में लौट जाता था,


नित्य प्रति दिन यही क्रिया, चल रही उसके जीवन में,

पेट भरने जाता कभी इस आंगन कभी उस आंगन में,

निकल जाता था बेफिक्र बेखौफ वो बारिश में धूप में,

नहीं जानता था कहांँ बहेलिया है छुपा इंसानी रूप में,


कैद कर लिया एक दिन उसको दाने का लालच देकर,

बड़ा खुश हो रहा था वो इंसान उसे पिंजरे में डालकर,

एक पल तो समझ ना आया, क्या हो रहा उसके साथ,

फड़फड़ा रहा था वो पंछी उड़ने की खातिर था बेताब,


पर उस इंसान को उस पर पर तनिक भी दया न आई,

कुचलकर उसकी आज़ादी अपने सुख की,की भरपाई,

अपने बेटे को जन्मदिन पर, उसे तोहफ़ा यह देना था,

पक्षी को दाना देने के पीछे, यही इसका औचित्य था,


खुशी-खुशी पहुंँचा, घर बेटे के हाथ में पिंजरा थमाया,

सबको है आज़ादी प्रिय, स्वार्थ में आकर ये भूल गया,

बच्चा तो नादान,पिंजरे में पंछी देख आनंदित हो उठा,

अपना खिलौना समझ कर, सदैव अपने पास रखता,


दाना पानी सब मिला पंछी को पर कुछ न उसे भाता,

ना चीं चीं आवाज़ करता और न ही पंख फड़फड़ाता,

मायूस हो गया वो बच्चा यह कैसा खिलौना है आया,

पिता के घर आते ही उसने सारा हाल उसको बताया,


पिता ने कहा कुछ दिनों में स्वयं ही ठीक हो जाएगा,

फिर बातें भी करेगा तुमसे ये, पंख भी फड़फड़ाएगा,

कुछ भी तो नहीं बदला था, एक दिन और बीत गया,

बच्चा पिंजरा छोड़, वही घर की चौखट पर बैठ गया,


देखा वहांँ पिंजरे के जैसे ही, कुछ पंछी खा रहे दाना,

खुशी से ऐसे चहक रहे थे मानो गा रहे हों कोई गाना,

कुछ सोचा फिर अंदर जाकर वो पिंजरा लेकर आया,

खोलकर पिंजरे का दरवाजा,पंछी को आज़ाद किया,


पिंजरे से निकलते ही मानों, प्राण उसने लौट आए थे,

जो ना जाने कब से उस पिंजरे की सलाखों में कैद थे,

साथी पक्षियों के साथ, खुशी-खुशी चुगने लगा दाना,

उड़ने को फड़फड़ा रहे पंख, आसमां में है उसे उड़ना,


बच्चा भी मुस्कुराने लगा, देखकर पंछी को चहकता,

कितना ख़ूबसूरत होता है, एहसास इस आज़ादी का,

पीछे उसके माता-पिता वहीं खड़े ये सब देख रहे थे,

अपने इस कृत्य पर वो, शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे,


स्वतंत्रता का महत्व, सभी जीवो के लिए एक समान,

स्वतंत्रता को समझकर भी, न समझ पाते हम इंसान,

तभी वो बच्चा बोला पापा इसको पिंजरे में मत रखो,

पिंजरे से बाहर रहकर वो पक्षी, कितना खुश है देखो,


कभी न लाना पापा मेरे लिए ऐसा कोई भी खिलौना,

मुझको बिल्कुल अच्छा नहीं लगता इनका चुप रहना,

एक मासूम ने,आज़ादी का सही मतलब समझा दिया,

आज़ादी सबको प्यारी, कितनी सरलता से बता दिया,


हमें हर प्राणी की स्वतंत्रता का करना चाहिए सम्मान,

स्वतंत्रता के बिना अधूरा है यहाँ, हर जीव, हर इंसान।


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