सवाल
सवाल
मेरी सोच मेरी बेड़ियां
मैं बाहर नहीं निकल पा रहा ।
करूं मैं कोशिश हर रोज़ ही
मगर मैं इनको रोज़ सहता जा रहा ।
देखूं कई चेहरे आस पास
हंसते खिलते, जीवन बिता रहे ।
रहूं मैं उदास हर पल, हर लम्हा
बेतुके सवाल, हर पल मुझे सता रहे।
लोग कहते मैं सोचता हूं,
मैं क्या सोचता हूं?
मैं हर वक्त उदास दिखता हूं, जब भी मुझे वो देखते।
ऐसा क्यों है?
क्या कुछ है? कोई परेशानी ? कोई मसला? बताओ क्या बात है?
कुछ हुआ है?
अब कैसे कहूं मैं उनसे
हां ! एक मसला है
मैं उदास हूं, परेशान हूं ।
सवाल है मगर जवाब से अनजान हूं।
खौफ है, मगर नाम नहीं
अब बोलना मेरा काम नहीं।
