सूनी डगर
सूनी डगर
सूनी यह डगर,अंधेरों में घिरी
न अपना कोई साथ, न पराया
कोशिशें सारी हो गईं नाक़ाम
साथ कोई भी नहीं निभा पाया
पहुंचने का किया अथक प्रयत्न
हर उस रिश्ते की तह तक,
जो लगता था बहुत अहम
हाथ आई बस निराशा ही
लगी न देर समझते
है नहीं ज़रूरत किसी की
इस दुनिया को-
नहीं पड़ता उसे फर्क
हमारे होने न होने से
न बदलेगा कुछ भी-
हमारे आने जाने से-
नहीं बदलेगा कुछ भी-
ख़ुदगर्ज़ यहां का ज़र्रा-ज़र्रा
रिश्ते पल भर में ढह जाते
रेत पर बने किलों की तरह
अभी बने अभी बिखर जाते
जगह बनी रहे हम इन्सानों की
जब तक कुछ कर पाएं हम
मगर जब होने लगें मजबूर
हाथ पांव न दें जब साथ
स्वच्छंद ज़िन्दगी जो जिए अब तक
बन कर रह जाए एक मृगतृष्णा
जब बीती बातें और गुज़रे लम्हे
रह रह कर आएं याद, कर दें आंखें नम
वह पल होते होंगे कितने दुखद
कैसा होगा वह अनुभव जिसमें
चलचित्र की तरह अपना जीवन
नज़र आता हो पलक मूंदते ही!
कब सोचा था यह दिन भी आएगा
सोचा भी हो तो मालूम न था
कल्पना और वास्तविकता में
होता है ज़मीन आसमान का फ़र्क
जब बीतती है ख़ुद पर
तभी आती है समझ
व्यथा किसी की,
टीस किसी के दुखते दिल की
ऐसा दिन देखेगा हर कोई
कैसे करें तय्यारी उसकी
दुख दर्द, क्लेश,भय से दूर
हो कर निर्भीक ख़ुद को रखें महफूज
स्नेह, ममता और प्रेम के बलबूते पर-
विश्वास की डोर बांधे रखे हमें
जीवन के हर पहलू से
यही विश्वास बने हमारे जीवन की नींव
खाई के उस पार पहुंच ही जाएंगे कभी न कभी
छूटेगी कभी न डोर ,बना रहे यही विश्वास।
