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Vinay kumar Jain

Abstract

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Vinay kumar Jain

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सुख दुख ही जीवन हैं

सुख दुख ही जीवन हैं

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सुख आए तो हंसते हैं 

दुःख आए सब रोते हैं 

दुख सुख दोनों आते हैं 

आकर दोनों ही जाते हैं 

न दुख रुकता है 

न सुख रुकता है 

सुख देर से आता 

जल्दी चला जाता 

दुख जल्दी ही आता देर से जाता 

दोनों का जीवन से है गहरा नाता

लगता है सबको सुख दूर रहता

दुख है जो जीवन संग रहता 

सोचो तो ऐसी बात नही है 

सुख दुख का खेल यही है 

अब हंस कर जी लो

या रो कर जी लो 

सुख दुख का खेल है सारा 

कोई है जीता कोई है हारा 

जैसे चाहो वैसे जी लो

कर्म करो और भाग्य बना लो



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