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अनजान रसिक

Abstract Inspirational

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अनजान रसिक

Abstract Inspirational

सत्यमेव जयते

सत्यमेव जयते

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सदियों से रघुकुल रीति है चली आयी, जब गुणगान रहा " सत्यमेव जयते " का।

पर आज के घोर कलियुग में जटिल दुविधा है ये, वास्तव में चरितार्थ कर सकते हैं इसे क्या ?

क्योंकि यूँ तो गली-गली में शोर है, झूठ बोलने वाला चोर है।

पर हर घर में रहता है एक ऐसा चोर, सच पर पर्दा डालता रहता संध्या हो या भोर।।

सच बोलो तो सहो अत्याचार, झूठ की होती सदा ही जयजयकार।

सच बोले रिपोर्टर कोई, तो मिल आती है उसको जेल की कैद,

और नेता बोलें झूठ, करें फरेब, पर हिस्से में आये ऐश और कैश

तभी कहते हैं सभी सच्चाई का न्यून हो गया है मोल,

डंका बजता तभी जब करते रहो हर कदम पर झोल।

पर सच तो होता श्वेत मोती के समान।

डूब जाए कितना भी, तनिक भी नहीं डगमगाता श्रीमान।

हर बुराई पर अंततः होता है अच्छाई का राज,

झूठ तो है एक नन्ही सी चिड़िया, सच्चाई तो है निडर निर्भीक अडिग जैसे कोई बाज़।

आज नहीं तो कल हो जाएगा दूध का दूध पानी का पानी,

सच्चाई की अहमियत आज नहीं तो कल प्रत्येक व्यक्ति ने है जानी।

हर दम सच की राह पकड़ो यकीनन मिलेगी प्रारम्भ में अथाह परेशानी,

पर लम्बी रेस के घोड़े इन क्षणिक विपदाओं से कहाँ डरते हैं जानी।

सत्यमेव जयते का यूँ ही नहीं दुनिया करती गुणगान,

मांगने से भीख भी नहीं मिलती, सच से स्वतः ही मिल जाते हैं भगवान।

समझो कीमत सच्चाई की, करते रहो हर दम इसका अनुसरण।

देख कर ज़माने का झूठ व पाखण्ड कभी ना डगमगाएं तुम्हारे कदम।।

क्योंकि सच्ची है वो कथनी जिसे कहते हैं सब " सत्यमेव जयते"।

इस से ना मुँह मोड़ना कभी, हर दम रहना इसका पाठ पढ़ते व पढ़ाते ..



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