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Bhavna Thaker

Abstract

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Bhavna Thaker

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स्त्री को समझो

स्त्री को समझो

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स्त्री शब्द नहीं मौन है,

पढ़ो नहीं महसूस करो, किताब नहीं जो एक दिन रद्दी बन जाएगी सम्मानित करो उमा का अंश है।

स्त्री के शारीरिक या मानसिक दायरे में उसकी इजाज़त के बगैर कदम रखने की कोशिश आपकी हल्की सोच का आईना होगा।

एक नज़र देखते रहे तो रात भर सो ना सके ऐसा दर्द-ए-दिल मत बनाओ,

स्त्री धूप सी पाक है दूर से उसकी महक को पहचानो मंदिर में देवी सी जानों 

तन को पाने की लालसा काम जगाती है

मन का संभोग प्रेम है ओर रूह का संभोग ध्यान। 

स्त्री की रूह को छूओ नज़रों से नहीं, ऊँगलियों से नहीं मन की आँखों से अपने साफ़ पाक इरादों से ध्यानाकर्षण की दहलीज़ पर खड़े रहकर बस साँसों में भरो। 

पराग सी छुईमुई झीनी तितली के पंखों सी नाजुक स्त्री आपकी स्नेहिल शर्तों पर संपूर्ण समर्पित सी आपकी अपनी महसूस करोगे।

आँखों से बलात्कार की भाषा बखूबी जानती है स्त्री स्त्री के प्रति मोह स्वाभाविक है पर,

नज़रों में दीये सी पवित्र लौ जलाओ, 

शब्दों में अगरबत्ती का अलख, और छुअन में इबादत सी असर रखो आपको आपकी छवि ही मंदिर में मूरत सी महसूस होगी।

स्त्री का एक ही लुभावने वाला रुप नहीं, 

स्त्री माँ है, बहन है, बेटी है, बहु है, भाभी है, देवी है आपकी अपने घर की इज्जत सी मानों।

जगत जननी जगदाधार है स्त्री, कोई मांस का टुकड़ा नहीं मत नोच कर खाओ कभी नज़रों से, कभी हाथों से, कभी जुबाँ से, गालियों की बौछारों में मत उलझाओ। 

स्त्री सन्मान की, प्रशस्ति की, प्रेम की हकदार है गुल से खेलना बंद करो सहज कर रखो सीप में मोती सी, अपने मजबूत बाजूओं से पनाह में लेकर सुरक्षित सी महसूस करवाओ निर्भय सी ज़िंदगी दो 

स्त्री को उसका हक दो, सन्मान दो, उचित स्थान दो।



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