स्थान-काल-पात्र
स्थान-काल-पात्र
मेरा कार्यस्थान
परिवर्तित ज़रूर हो चुका है,
मगर मेरी योग्यता में
कहीं कोई कमी नहीं आई।
ये उन लोगों की
गलतफहमी होगी,
जो वो मुझे
नाकारा समझते होंगे...!
अरे, मैं जो
कार्य कर सकता हूँ,
वो मैं
भलीभांति जानता हूँ...!!
हाँ, वक़्त सबका ही
बदलता है...
और आज मेरा भी
बदल चुका है।
एक इंच भी
मेरी क़ाबिलियत का
इधर-का-उधर
नहीं हुआ...;
ये सौ फीसदी
सच्ची बात है....!
इसमें कोई दो राय नहीं
कि मेरे दिल में
कार्यस्थान को लेकर
कोई अफसोस नहीं...
जो भी हुआ, अच्छा ही हुआ
अंधेरी गलियों को चीरते हुए...
सच्चे-झूठे दुनियावालों के
चेहरों से नक़ाब उठाते हुए
आज इस कड़वे सच से
वाकिफ हुआ हूं
कि यहां मूकदर्शक बन
दुबके रहने से
कुछ नहीं हो सकता...!
यहां तो अपनी औकात
वक्त के तकाज़े से
दिखानी ही पड़ती है...!!!
वरना यहां आपको
हकीक़त में तवज्जोह नहीं मिलती!
