STORYMIRROR

Sumita Sharma

Inspirational

3  

Sumita Sharma

Inspirational

सर्वेश्वर

सर्वेश्वर

1 min
234

तुम मानते रहे स्वयं

को मेरा परमेश्वर

और  निर्धारित करते रहे 

रोज़ मेरे लिये 

अनचाही सीमाएं

सेविका और सेव्य

के मध्य कब

प्रस्फुटित हुआ 

है प्रेम?


सुलगते अंगारे से 

कोयला हुआ मन

परिणीति

है मेरी भावना

की, अन्त तक

तुमसे बदलाव की

आस लगाते रहने की



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational