सरसी छंद - मुस्कान
सरसी छंद - मुस्कान
सरसी छंद (१६,११) - मुस्कान नित नूतन मुस्कानों का हम, रोज लगाएं बाग। और बुझाएं सुलग रही जो, मन की अपने आग।। शांत चित्त हो चिंतन करिए, निज जीवन का सार। कितना उचित है या फिर अनुचित, नाहक लेना भार।। अपनी भी है जिम्मेदारी, यही सीख लो बाँट। प्रेम प्यार से चाहें कुछ को, या फिर कुछ को डाँट।। खुद के ही दुश्मन बन जाते, जाने कैसे लोग। रोग बढ़ाते पालपोस कर, झेंप-झेंप कर भोग।। नादानी अब हम सब छोड़े, दें सबको संदेश। मानों सब कुछ पास तिहारे, मानो स्वयं नरेश।। मुस्कानों की छोटी-छोटी, बगिया रोपें रोज। निंदा नफ़रत क्रोध ईर्ष्या, क्यों करना है खोज।। यही सूत्र है मुस्कानों का, आप करो स्वीकार। मिल-जुलकर सबको रहना, चाह छोड़ दरकार।। बात सरल सीधी साधी है, बाँध रखो सब गाँठ। नहीं किसी को हममें बनना, जानबूझकर काठ।। समझ गए सब तो है अच्छा, छोटी सी ये बात। नहीं समझ आया तो जाओ, खाओ जूता लात।। नाहक नहीं नसीहत मेरी, मत कहना तुम व्यर्थ। सोच-समझकर बात हमारी, जानो पहले अर्थ।। बस इतनी सी दुआ हमारी, ऐसा दिन हो खास। मानव मन मे मुस्कानों की, अपनी बगिया खास।। सुधीर श्रीवास्तव
