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Prakash Kumar

Drama

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Prakash Kumar

Drama

सपना जो रूठ गया

सपना जो रूठ गया

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ना जाने कितनी अच्छी है तू !

किसी खूबसूरत सपने सी सच्ची है तू !

आंखें बंद होते ही तू है,

खुलते ही तेरी तलब।


ना जाने मुझे ये क्या हुआ ?

क्यों मैं तुझपे फिदा हुआ !

ये सवाल, ये सवाल अच्छे लगते है।

मेरी आँखों को जगना अच्छा लगता है

सपनो में बस तुम्हें देखना अच्छा लगता है।

सबकुछ जैसे सपना है...

लगता फिर भी अपना है।


तुम ना होती तो मेरी कविता का क्या होता ?

कब, कहाँ, क्यों, किसके लिए,

कैसे गा रहा होता ?

फिर तो रह जाता न अकेला मैं !


इस दुनिया मे

मुझ अकेले का क्या होता...

मुझ अकेले का क्या होता...!


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