सफर
सफर
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है,
सबकी अपनी अपनी डगर है,
किसको जाना किधर हरेक बेखवर है,
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है।
होता है जन्म एक जैसा सभी का,
फिर क्यों कर्म अलग अलग हर किसी का,
कोई भरता है पेट वैठ कर
कोई दिन भर पेट न भर पाया,
यही फलसफा है जिन्दगी का जो मेरी समझ में न आया,
जिन्दगी का सफर अजीब सफर है हरेक बेखवर है।
कोई ओढ़ता है मखमल कोई बदन न ढक पाया,
कोई सोता है महल में, कोई घर न बना पाया,
क्या यही जिन्दगी है मेरी समझ में न आया,
जन्म तो एक जैसा था फिर अलग अलग रास्ता क्यों अपनाया,
इन्हीं बातों से सुदर्शन वेखवर है,
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है हरेक बेखबर है।
बचपन में हरेक होता है राजा
फिर राजा को रंक क्यों वनाया,
कोई चलता राह पर तो कोई कंयों दर वदर है,
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है, हरेक बेखवर है।
कोई जीता है लम्वी उम्र कोई आधी जिन्दगी न कट पाया,
कोई काटता है जिन्दगी मात पिता के छाये में
किसी को अनाथ आश्रम भी नहीं मिल पाया,
अगर जन्म लिया था एक जैसा तो फिर क्यों यह कष्ट पाया,
यही समझ न आया यह कैसी डगर है,
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है।
कोई भरता है हवा में उड़ान,
कोई भूमी का सफर न कर पाया,
कोई झूमता है खुशियों में कोई एक दिन भी न हंस पाया,
यह कैसा अन्याय का जिक्र है,
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है हरेक बेखबर है।
करता है सुदर्शन विनती प्रभु आगे,
भर दो झोली हर निर्धन की आके,
तुम्ही हो नाथ सभी के तुम्ही को फिक्र है,
फिर क्यों अन्जान नजर है,
जिन्दगी का सफर भी अजीब सफर है हरेक बेखबर है।
