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Surendra kumar singh

Abstract


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Surendra kumar singh

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सफर में हैं

सफर में हैं

1 min 12 1 min 12

अनुभव के साथ सफर में हैं तो

लगता है कोई साथ साथ है

और जब वो आदमी की तरह

बोलने लगता है

तो आश्चर्य से


चारो तरफ नजरें घुमाते हैं

कि कौन कहाँ बोल रहा है

कोई हो तो न दिखे

फिर चल पड़ते हैं

और आवाजें आने लगती हैं


जो नहीं होना चाहिए

वो खूब हो रहा है

और जो होना चाहिये

वो होने के लिये मचल रहा है

जैसे भागते हुये समय में


कोई पल ठहर सा गया है

ये होना कितना सहजता से

सम्भव था

फिर अब तक हुआ क्यों नहीं।


शायद सहजता

असम्भव सी हो गयी है

या सहज होना

मनुष्य की जरूरत नहीं रही।


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