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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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सम्मोहन

सम्मोहन

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दिलकश खूबसूरती के

सम्मोहन में खिंचता खिंचता

बहता बहता

उजाले और अंधेरे के संगम पर

पहुंचकर


अब मुझे कुछ

अजीब सा लगने लगा है

यहाँ भी मजा है

वहाँ भी मजा था

यहां एकाकीपन है


वहाँ भीड़ थी

यहां चिन्तन है

वहाँ लोकप्रियता थी

लोकप्रिय चिंतन में डुबा हुआ

उजाले और अंधेरे के संगम पर

मजा ही मजा है।


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