STORYMIRROR

Indu Kashyap

Romance

4  

Indu Kashyap

Romance

समिधा

समिधा

1 min
493

रंगों के इस पावन पर्व पर

मेरे हृदय का

सारा आकाश

बृजभूमि हुआ जा रहा है

और

तुम्हारे इन पलाश-वन

नेत्रों का

अबीरी रंग

मुझमें

महारास जाग्रत कर रहा है

तुम्हारी दृष्टि का गुलाल

मुझे लज्जारंग में

भिगोय दे रहा है

प्रिय !

यह

तुम

जो अपनी दृष्टि में नेत्रों में

पलाशों का दहकता

अग्निकुंड

लिये फिरते हो

मेरे अस्तित्व की समिधा

स्नेहपूरित हो

उसमें हव्य होने

को आतुर है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance