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nida Siddiqui

Tragedy Inspirational Children

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nida Siddiqui

Tragedy Inspirational Children

स्क्रीन का पर्दा और तन्हा बचपन

स्क्रीन का पर्दा और तन्हा बचपन

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हाथ से फ़ोन तो तुमने पल भर में छीन लिया,
पर कभी यह देखा कि मैं उसमें क्या ढूँढ रहा था?
जब घर में अपनी बात सुनाने का कोई ज़रिया न मिला,
तब मैं उस स्क्रीन के पीछे अपना अकेलापन समेट रहा था।
ना कभी तुम दो पल मेरे पास आकर बैठे,
ना कभी खेल-कूद कर मेरा बचपन देखा।
जब भी कुछ कहने आया उम्मीदों का दामन थाम कर,
तुमने बस "अभी फुर्सत नहीं, बाद में" कह कर टाल दिया।
फ़ोन तो सिर्फ एक बहाना था उस सन्नाटे को भरने का,
जो तुमने धीरे-धीरे मेरे और अपने बीच बना दिया है।
इस बड़े से कमरे में भीड़ तो बहुत है अपनों की,
पर तुम्हारी इस बेरुखी ने मुझे भीड़ में भी अकेला बना दिया है।
मुझे किसी महंगे खिलौने या चमचमाती स्क्रीन की चाहत नहीं,
मुझे तो बस आपके प्यार और थोड़े से वक्त की ज़रूरत है।
ताकि मैं गले लगकर कह सकूं कि मैं उदास क्यों हूँ,
मुझे सिर्फ सिर पर आपका एक प्यार भरा हाथ चाहिए।


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