तुलना और पहचान
तुलना और पहचान
"तुलना और पहचान"
क्या कुछ कम नंबर आ जाने से,
मेरी जगह बदल जाती है?
क्या एक कागज़ के टुकड़े से,
मेरी औलाद होने की पहचान सिमट जाती है?
तुमने फिर वही किया...
दूसरे के बच्चे की चमक देखी,
और मेरी कोशिशों का अंधेरा कर दिया।
बिना पूछे, बिना समझे,
मुझे किसी और के तराज़ू में तोल दिया।
क्या मैं वो नहीं,
जिसकी हर पहली उंगली तुमने थामी थी?
क्या मेरी कोशिशों में,
तुम्हारे प्यार की ही कोई कमी थी?
कमज़ोर अंक मेरी हार हो सकते हैं,
पर मेरी पहचान तो नहीं।
मुझे बस एक बार समझकर थाम लेते,
तो क्या मैं तुम्हारा अपना नहीं?
