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Chandresh Kumar Chhatlani

Inspirational

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Chandresh Kumar Chhatlani

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सीमा पर होली

सीमा पर होली

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जब रेत संग हवाएँ उठतीं, धूल बनकर गूंज उठें,

काँटों के उस पार हैं वो, जो गर्व से सीना तान खड़े।

माथे पर रण का तिलक है, हाथों में है देश का मान,

होली होती जलकर यहां विजय और साहस का दीप महान!


न गुलाल, न पिचकारी, न रंगों की कोई धार,

बस बंदूकों की गर्जना में गूँज रहा है जय जयकार।


अबीर बना लहू शौर्य का, गुलाल वीरों की है जीत,

सीमा पर यह होली देखो, रणवीरों की है प्रीत।


डाक से आया माँ का संदेश, भाई ने भेजा है प्यार,

लिखा—"तेरी होली वहीं है, तिरंगे का हो जहाँ सत्कार!"


मिट्टी माथे, दिल में हिम्मत, आँखों में विश्वास वही,

वीर हँसा—"माँ, मेरी होली, जब तक देश की शान रही!"


कंधे पर बन्दूक थामे, मन में उसके प्रेम अपार,

सर्द हवाओं को चीर रही, वीरों की ललकार।


जहाँ हिमशिखरों पर ध्वज लहराए, गर्वित हो यह संसार,

वीरों की यह होली देखो, शत्रु को देती चीत्कार।


रंग नहीं, पर राष्ट्रधर्म की आभा है यहाँ दमकती,

होली यह बलिदानों की,भारत सीमा पर चमकती।


हर सिपाही है एक दीपक, जो तम को है दूर भगाता,

होली पर हर जीवन, भारत माँ की जय-गाथा है गाता!


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